कानपुर/देहात|(विवके कुमार त्रिवेदी)गरीबी का आलम कुछ ऐसा भी होता है, ये शायद किसी ने नही सोचा होगा कि कोई गरीबी के इस मंजर से भी गुजर रहा होगा कि अपनी बूढ़ी मां व बच्चों का पेट पालने के लिए से लिंग परिवर्तन करना पड़ सकता है, कुछ ऐसे हालातों से मजबूर होकर युवक हरजीत को कुछ वर्षों पहले किन्नर भी बनना पड़ा। आज भी वह कच्चे आवास में अपने परिवार के साथ रहकर उन्ही हालातों से गुजरते हुए अन्य किन्नरों के साथ समम्मिलित होकर परिवार का भरण पोषण कर रहा है। लेकिन आज भी प्रदेश सरकार की आवास योजना का उसे लाभ नही मिल सका है। वह मांगकर गुजर बसर तो कर रहा है लेकिन प्रधान द्वारा मांगे गए रुपये न देने पाने के कारण कच्चे मकान में ही गुजारा कर रहा है।
जहां एक तरफ सूबे की योगी सरकार तमाम लाभान्वित योजनाएं चलाकर गांव के गरीबों को लाभ देने के दावे करती है, और घोषणा करती है कि भाजपा सरकार गरीबो और किसानों की सरकार है, जो उनके सुख दुख में साथ है। जो गरीब कच्चे मकानों, झोपड़ियों में रहते है, उन्हें आवास योजना से निशुल्क पक्के आवास देकर राहत दी जाएगी लेकिन कानपुर देहात के विकास खण्ड रसूलाबाद में एक ऐसे प्रधान पति की दबंगई सामने आई, जो गरीबों को आवास देने की बजाए उनका आशियाना उजड़ने में लगे हुए है, और अफसर भी चुप्पी साधे हुए है। ब्लाक के असालतगंज के चौबेपुर की एक गरीब महिला जगरानी को ग्राम प्रधान ने आवास नही दिया, उसकी गलती ये थी कि उसने प्रधान को 30 हजार रुपये नही दिए।
जब गरीब महिला जगरानी पत्नी स्वर्गीय सूबेदार का कहना है कि प्रधान रसीदन के पति मुमताज अहमद उर्फ़ भोला की अपनी ग्राम पंचायत में इस कदर गुंडई है कि जो गरीब रूपये नहीं दे पाते, उनको आवास पाने का कोई अधिकार नहीं है।  जिसने पूरे तीस हजार रुपये नहीं दिए उसको आवास बनाने भी नहीं देते है। आरोप है कि यदि गरीब किसी प्रकार बनाते भी है तो प्रधान जी पुलिस भेज कर धमकियां भी दिलवाते है। जिससे गांव के गरीब आजिज हो चुके है।
वहीं जो आवास के पात्र ही नहीं है, जिसका पक्का मकान बना हुआ है, उसको आवास दिया जा रहा है। ऐसे एक दो नहीं कई आवास है, जो मानक से हटाकर दिए गए है। हद तो ये है कि  गरीबी के चलते जिस इंसान को किन्नर बनना पड़ा हो, ऐसे गरीब परिवार को भी आवास नही दिया गया। परिजनों का आरोप है कि इसमें ग्राम प्रधान व विकास खण्ड के अधिकारियों की मिलीभगत आज गांव के गरीब आवास विहीन है। अब सवाल ये उठता है कि यदि प्रधानों की ऐसी कार्यशैली रही तो कैसे पूरे हो पाएंगे सरकार के सपने और कैसे गरीबों को रहने को आशियाने मिलेंगे।

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