गिरधारी पाण्डेय

 

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में अठारह वर्षीय बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार के आरोपी विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना और बालिका के पिता की जेल में पिटाई से मौत हो जाना प्रदेश सरकार पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।

 
 
उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में अठारह वर्षीय बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार के आरोपी विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना और बालिका के पिता की जेल में पिटाई से मौत हो जाना प्रदेश सरकार पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। दूसरी तरफ जम्मू के कठुआ जिले में आठ वर्षीय बालिका की सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई लेकिन मुसलिम बालिका होने के कारण कुछ कट्टर धार्मिक संगठन बलात्कार आरोपियों के पक्ष में खड़े हो गए। पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार करके अदालत में पेश करना चाहा तो कठुआ बार एसोसिएशन ने उन्हें रोक दिया।
 
इन दोनों मामलों में सरकार की कथनी और करनी का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। साथ ही समाज का काला पक्ष उजागर हुआ है कि निर्भया को देश की बेटी बताते हुए जिस समाज और मीडिया ने आंदोलन खड़ा कर दिया था वह समाज और मीडिया इन गंभीर घटनाओं पर मौन क्यों है? अगर निर्भया के लिए पूरा देश सड़क पर आ सकता है तो अशिफा और उन्नाव गैंगरेप की पीड़िता के समर्थन में हम सड़कों पर क्यों नहीं आ सकते?
 
 
कब तक बलात्कार होते रहेंगे? एक तरफ देश को कलंकित करने वाले मामले घटित हो रहे हैं तो दूसरी तरफ सलमान की जेल या बेल, छोले-भटूरे जैसे मुद्दों पर बहस कर की जाती है। लगता है, महिला सशक्तीकरण और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी बातें करने वाले नेताओं तथा मीडिया की संवेदना मर चुकी है। नैतिकता के तौर पर हमारा समाज अंदर से सड़ चुका है। आज समाज को ऊंच-नीच, जातीय भेदभाव और धार्मिक कट्टरता जैसी संकीर्ण सोच ने तबाह कर दिया है। कागजों व आंकड़ों के खेल में चलाए जा रहे बेटी बचाओ जैसे अभियानों को हकीकत के धरातल पर उतारना होगा।

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