युवा नेता ज्योतिरादित्य मध्य प्रदेश में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। ग्वालियर राजघराने से ताल्लुक रखने वाले सिंधिया ने युवराज की छवि को परे रखते हुए मध्य प्रदेश में परिवर्तन यात्रा के जरिये करीब एक लाख किलोमीटर का दौरा कर जमकर पसीना बहाया है और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ माहौल बनाने के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरा है। चुनावी सर्वेक्षण भी बता रहे हैं कि कांग्रेस राज्य में 15 साल से काबिज भाजपा को कड़ी टक्कर दे रही है और पासा पलटने की भी स्थिति में है। ऐसे में देखना होगा कि परिवर्तन की उनकी मुहिम कामयाब होती है या नहीं।

राजनीतिक विरासत को बखूबी संभाला: 47 वर्षीय ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश की गुना संसदीय सीट से लोकसभा सांसद हैं। कांग्रेस के युवा नेताओं में शुमार ज्योतिरादित्य सियासी माहौल में पले-बढ़े हैं। उनके पिता स्वर्गीय माधव राव सिंधिया कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं। परिवार की राजनीतिक विरासत को उन्होंने बखूबी संभाला है। साल 2002 में गुना से सिंधिया भारी अंतर से जीतकर पहली बार संसद पहुंचे थे और जब 2014 में कांग्रेस को सिर्फ 44 सीटें मिलीं, तब भी वह लगातार चौथी बार सांसद चुने गए। हालांकि उन्होंने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है।

पहली बार 2008 में केंद्र में बने मंत्री: सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया छह अप्रैल 2008 को पहली बार मनमोहन सरकार में सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री बनाया गया। यूपीए-2 में जब मनमोहन सिंह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने तो सिंधिया को ऊर्जा मंत्रालय में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का दर्जा दिया गया।

चुनाव में प्रचार की कमान: कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में गुटबाजी रोकने के लिए किसी को भी मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तो नहीं बनाया है, लेकिन गुना से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस चुनाव प्रचार समिति का चेयरमैन बनाकर अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रचार की रणनीति तय करने में उनकी अहम भूमिका दिख रही है। ज्योतिरादित्य ने चुनाव प्रचार में शिवराज सिंह को सीधे निशाने पर रखा है, इससे भी उनकी दावेदारी मजबूत हुई है।

ताकत: उनके भाषणों में सौम्यता और आक्रामकता का अनोखा मिश्रण है। रैलियों और अन्य सार्वजनिक मंचों पर वह बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। यही वजह है कि उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। संसद में भी जब उन्हें मौका मिला है, तो तथ्यों के साथ सरकार को घेरने में उन्होंने कभी नरमी नहीं बरती।

जमीनी राजनीति से जुड़े: सिंधिया भले ही राजघराने से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन अपने पिता की तरह वह भी जमीनी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। वह दिल्ली और अपने संसदीय क्षेत्र में लोगों से मिलते हैं और उनकी शिकायतों का निराकरण करते हैं। वह कार्यकर्ताओं के बीच सीधे संवाद करना और उनके घर जाकर भोजन करने से भी गुरेज नहीं करते।

कमजोरी

प्रदेश की राजनीति में सक्रियता कम रही: ज्योतिरादित्य इस चुनाव के पहले राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कभी विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ा है। वहीं सिंधिया ने भले ही राजा होने की छवि को झुठलाया हो, लेकिन चुनाव में भाजपा शिवराज को किसान का बेटा बताने के साथ राजपरिवार से जुड़े सिंधिया के बीच तुलना करना नहीं भूलती।

मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बने: युवा और काबिलियत के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें मध्य प्रदेश में सीएम पद के चेहरे के तौर पर पेश नहीं किया है। सत्तारूढ़ पार्टी इसे भुनाते हुए प्रचार में कह रही है कि कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं है, जो सीधे शिवराज सिंह चौहान से मुकाबला कर सके। कांग्रेस इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में नजर आ रही है।

घुड़सवारी और क्रिकेट पसंदीदा: ज्योतिरादित्य को गाड़ियों, गोल्फ और घुड़सवारी का शौक है। स्कूली शिक्षा के दौरान उन्होंने निशानेबाजी में भी हाथ आजमाया। क्रिकेट भी उनका पसंदीदा खेल है, वह मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं।

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