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विधानसभा चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादे के अनुरूप प्रदेश की कमलनाथ सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाने जा रही है। इस फैसले के साथ ही अपेक्षा यह भी है कि मुख्यमंत्री बड़े अफसरों पर भी कार्रवाई करे जो अब तक जांच के घेरे में आने से बचाए जाते रहे हैं। प्रदेश में अब तक छोटे अफसरों पर ही लोकायुक्त की गाज गिरी है। हालांकि अब सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों में कुछ बदलाव किया है ताकि अब ट्रैप कार्रवाई के बाद रिश्वत लेने वाले को जेल जाना पड़े। वहीं सरकार लोकायुक्त और
ईओडब्ल्यू में भ्रष्टों की दबी फाइलों को पुन: खोलने जा रही है। इस कारण करीब 30 नौकरशाहों सहित 3 हजार से अधिक अफसरों व कर्मचारियों पर गाज गिर सकती है। प्रदेश में कांगे्रस की सरकार बनने के साथ ही राज्य मंत्रालय में पदस्थ आईएएस से लेकर जिलों में पदस्थ अफसरों के बीच हडक़ंप मच गया है। इसकी वजह है भाजपा के 15 साल के शासन के दौरान हुए भ्रष्टाचार के प्रति सरकार का सख्त रुख। यही कारण है कि सरकार ने सुशोभन बैनर्जी को एडीजी लोकायुक्त, एसएम अफजल को एडीजी ईओडब्ल्यू और केएन तिवारी को स्पे. डीजी ईओडब्ल्यू बनाया गया है। ये अफसर अपनी स्वच्छ, ईमानदार और सख्त छवि के लिए जाने जाते हैं।
हर बार बच जाती हैं बड़ी मछलियां
प्रदेश में जितनी भी लोकायुक्त की कार्रवाईयां हुई हैं उनमें अब तक अरबों रुपए घोटाले के आरोपी लोकायुक्त की नजर बचते रहे हैं या बचाए जाते रहे हैं। तथा ज्यादातर लोकायक्त के छापे इंदौर-उज्जैन में ही पड़े हैं। जिनमें छोटी मछलियां-चपरासियों, पटवारियों और बाबुओं यहां करोड़ों की संपत्तियों का खुलासा हुआ है। लेकिन घोटाले के आरोपी बड़े अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
नौकरशाहों ने सालों तक दबा रखी फाइल
शिवराज सरकार में जिन नौकरशाहों के खिलाफ लोकायुक्त में शिकायत की गई थी, वे शिकायतें गंभीर होने बावजूद भी सीएम सचिवालय के शीर्ष नौकरशाहों के दबाव में जांच के दायरे में नहीं आ पाई और उसमें दीमक लगने लगे। लोकायुक्त के सूत्रों का कहना है कि उपरोक्त फाइलों की जानकारी लोकायुक्त को दी ही नहीं गई वरना कई बड़े बड़े नौकरशाह अभी तक नए जाते।
किस शहर में कितने मामले लंबित
शहर कुल मामले 5-10 साल 1-3 साल
भोपाल 194 42 152
इंदौर 115 61 09
उज्जैन 50 8 42
सागर 47 7 40
रीवा 43 8 35
ग्वालियर 46 5 41

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