सुलतानपुर। राजनीतिक गलियारों में अच्छी रसूख रखने वाले सूबे के पूर्व
मंत्री के यू-टर्न से बसपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने के
इच्छुक नेताओं की धड़कनें तेज हो गयी है। दावा किया जा रहा है कि समय रहते
पूर्व मंत्री ने बाजी मारी और बसपा सुप्रीमो के खासमखास से सेटिंग भी कर
ली। हालांकि बसपा का एक खेमा इनके यू-टर्न में नमक मिर्च लगाकर बसपा
सुप्रीमों के कान भर रहा है।
बताते चलें कि बसपा सरकार में स्वतन्त्र प्रभार के पर्यटन मंत्री रहे
विनोद सिंह बसपा सुप्रीमों के काफी करीबी माने जाते थे और जिले से लेकर
प्रदेश के नेताओं में उन्होंने अपनी मजबूत पकड़ भी बना ली थी। इसी के चलते
उन्होंने अपने भाई अशोक सिंह को विधानपरिषद का सदस्य भी बनवाने में सफल
रहे थे। लगातार दो चुनाव में पराजय के बाद उन्होंने अपनी व्यस्तता का
हवाला देते हुए धीरे से बसपा का दामन छोड़ यह कहते हुए छोड़ दिया था कि वे
राजनीति में समय नहीं दे पा रहे हैं। हालांकि उनके बसपा से किनारा कसने
के पीछे कयास लगाये जा रहे थे कि दूसरी पार्टी में जाना चाहते हैं। लेकिन
फूलपुर गोरखुपर के चुनाव में भाजपा की करारी हार और आने वाले दिनों में
महागठबन्धन बनने की सम्भावनाओं को देखते हुए उन्होंने घर वापसी का निर्णय
लेते हुए बसपा सुप्रीमों के खास को विश्वास में लेकर हरी झण्डी ले ली।
हालांकि पूर्व मंत्री विनोद सिंह के घर वापसी का पार्टी जनों ने स्वागत
किया लेकिन ऐसी सेटिंग बनाई कि इनका टिकट भी पक्का होना तय माना जा रहा
है । इससे टिकट की चाह रखने वाले सफेदपोशों में खलबली मच गयी है। बताते
चलें कि विनोद सिंह कई सालों तक जिले में कांग्रेस पार्टी का झण्डा उठा
रखे थे। संयोगवश इनके सिर पर कांग्रेस पार्टी की बदौलत जीत का सेहरा नहीं
बंध पाया था । इसके बाद विनोद सिंह ने हाथी की सवारी की। किस्मत साथ दे
गयी और विधायक बनने के बाद मंत्री पद भी मिला। वर्ष 2017 के चुनाव में
कांग्रेस बसपा और सपा का सूपड़ाा साफ हो गया । सूत्रों के मुताबिक
राजनैतिक वजूद बचाने के लिए इनके द्वारा प्रदेश और केन्द्र में अपना परचम
लहरा रही भाजपा से नजदीकियां बढ़ानी शुूरू कर दी थी। उपचुनाव में फिर से
भाजपा अपने उतार पर पहुंच चुकी है। ऐसे में इनकी घरवापसी को इसी से जोड़कर
देखा जा रहा है।
कई धुरन्धरों से इनका है छत्तीस का आंकड़ा
पूर्व मंत्री विनोद सिंह मास्टरमाइन्ड माने जाते हैं । इनके दिमाग का
लोहा इनके विपक्षी भी मानते हैं। ऐसे में इनके विरोधियों की संख्या भी कम
नहीं है । जिले के कई बाहुबली इनके धुर विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में
चुनाव के दौरान अब इन्हें कई मुश्किलों से गुजरना पड़ेगा।

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