रिपोर्ट: अमन वर्मा फैजाबाद मंडल हेड

यह स्थान अल्देमऊ भरो के शासनकाल में प्रतापी भर राजा अल्दे की राजधानी हुआ करती थी!

सुल्तानपुर. आध्यात्मिक, राजनैतिक, साहित्य के क्षेत्र में जनपद में ही नहीं वरन पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखने वाला जिले की पूर्वी सीमा स्थित स्थान कादीपुर, जो अपने गर्भ में विभिन्न सांस्कृतिक आध्यात्मिक धरोहरों को छिपाए रखा है। इसी क्रम में पुरातात्विक महत्त्व का शैव तंत्र साधना का महत्वपूर्ण स्थान है अघोर पीठ बाबा सत्यनाथ मठ।

यहां है 5 हजार साल पुराना अघोरियों का तीर्थस्थल

अघोर पीठ बाबा सत्यनाथ मठ जो कादीपुर चौराहे से चांदा मार्ग पर अल्देमऊ नूरपुर गांव में आदि गंगा गोमती के पावन तट पर स्थित है। अघोरियों का यह प्रमुख साधना केंद्र अब भी बहुत से रहस्य समेटे हुए है वर्षों पहले वीरान पड़े इस शैव साधना स्थल पर हरिश्चंद्र घाट काशी के श्मशान पीठ के पीठाधीश्वर अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा ने आकर पुरातात्विक महत्व के इस स्थान को पुनः पुराने गौरव को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं। अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा ने इस स्थान का रहस्योघाटन करते हुए बताया की यह स्थान शैव साधना का अति प्राचीनतम स्थान है। मैंने अपने साधना और तप के माध्यम से जो जानकारी प्राप्त किया है वो यह है कि यह स्थान अघोर परंपरा के नव नाथो में प्रथम नाथ ब्रम्हा के अवतार बाबा सत्यनाथ की साधना व समाधि स्थल है। लगभग 5000 साल पुराना महाभारत काल का स्थल अघोरियों के साधना का प्रमुख स्थल है। शैव साधक और अन्य जनसामान्य के लिए यह स्थान किसी भी तीर्थ से कम नहीं है।

बाबा सत्यनाथ ने बसाया

कादीपुर नामक स्थान भी बाबा सत्यनाथ के द्वारा बसाया गया है क्योकि अघोर परंपरा में साधना की 5 धाराएं हादि, कादि, ओमादी, वागादि, प्रणवादि के माध्यम से अघोर साधक अपने स्तर से साधनाएं करता है। बाबा सत्यनाथ कादिधारा के प्रवर्तक थे, बाबा के द्वारा बसाये गए गांव या नगर कादीपुर कहलाए इस स्थान पर अभी भी कादिधारा यन्त्र विद्यमान है जो आम जन के दर्शनार्थ मंदिर में शिवलिंग और अर्घा के रूप में रखा गया है।

प्राचीनकाल का युध्स्थल है ये स्थान

इस क्षेत्र में अघोर परम्‍परा के नव नाथों में प्रथम नाथ ब्रम्हा के अवतार जिनका स्वरुप जल है। ऐसे अघोराचार्य बाबा सत्‍यनाथ के बारे में अनेक चमत्कारिक किंवदन्तिया, कहानियां आदि अभी भी गावों में प्रचलित हैं। इस साधनास्थल पर अनेक सिद्ध सन्यासियों, अघोरियों ने साधना करके पराशक्तियों को अर्जित कर अपने जीवन को सुगम व सरल बनाया है। पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह स्थान प्राचीनकाल का युध्स्थल है। यह स्थान अल्देमऊ भरो के शासनकाल में प्रतापी भर राजा अल्दे की राजधानी हुआ करती थी।

आज भी दिखती हैं किले की दीवारें

इसका प्रमाण यहां खंडहर में परिवर्तित किला व किले की दीवारें आदि आज भी दिखाई दे रही हैं। भौगोलिक स्थिति के आंकलन मे 90° के कोण पर मुड़ी आदि गंगा गोमती व इस मठ के इर्द गिर्द बड़े बड़े टीले शांत वातावरण साधना क्रम मे ऊर्जा प्रदान करते ही है। वही दूसरी तरफ पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थल महत्वपूर्ण है। हम यहां जनता के सहयोग से हम लोगों का यह तीर्थ जो प्रशासनिक व राजनैतिक स्तर से उपेक्षित होकर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा था।

किया जा रहा है विकसित

उऩ्होंने बताया कि अब इसे विकसित किया जा रहा है, आने वाले समय में सुल्तानपुर जनपद का यह शैव साधना केंद्र जनपद में ही नहीं पूरे देश में अपना एक पहचान बनेगा। आज भी अनेक विदेशी शैव साधकों सहित देश के शैव साधक / अघोरी अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ के पीठाधीश्वर अवधूत कपाली बाबा को साधना की प्रतिमूर्ति मानकर आये दिन इस स्थान पर साधना रत देखे जाते हैं। पुरातात्‍विक एवं अध्यात्मिक महत्व का यह स्थान फिलहाल सरकारी सुविधाओं से वंचित है पर्यटन की असीम संभावना वाला यह क्षेत्र आज विकास की बाट जोह रहा है।

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