स्टेट ब्यूरो-धीरु सिंह

रेलवे के नाम पर एक बड़े जमीनी घोटाले का पर्दाफाश

सिर्फ 3 दिन में हुई जमीन की 50 रजिस्ट्रियां

कलेक्टर ने लगाई नामांतरण पर रोंक

जिला प्रशासन के संबंधित विभाग के अधिकारियों के शामिल होने पर खुलासा

कई अधिकारियों के रिश्तेदारों के नाम से भी हुई रजिस्ट्रियां

मध्य प्रदेश सीधी जिले में विगत वर्ष से रेलवे के भू अधिग्रहण को लेकर जमीनों की कई जगहों पर रेलवे लाइन में जमीन फंसने के फर्जी धावों के साथ की गई जमीनों की बिक्री तथा कई मामलों में रेलवे लाइन में वास्तव में फंसे लोगों के मुआवजे में घोटाले के मामले अभी भी लगातार जारी हैं।

ऐसे ही ताजे खुलासे में सीधी जिला मुख्यालय में बहने वाले सूखा नाला की जमीन की तीन दिवस के भीतर 50 रजिस्ट्रियां यह कहकर करा दी गईं कि यह जमीन रेलवे लाइन में फंस रही है जिससे इस जमीन को खरीदने वालों को लगभग 50 लॉख रूपये के आसपास मुआवजा और नौकरी मिलेगी।
आनन फानन की गई रजिस्ट्रियों का आलम यह रहा कि मात्र तीन दिवस 17,18 और 19 सितंबर में ही ताबड़तोड़ 50 रजिस्ट्रियां हो गयीं। जिसमें करोड़ों रुपए से अधिक की खरीद बिक्री का अंदेशा है।
3 दिनों में हुई इन 50 रजिस्ट्रियों में सबसे चौंकाने वाले तथ्य यह भी सामने आए की इसमें से तकरीबन दर्जनों रजिस्ट्रियां उन अधिकारियों के परिजनों के नाम से की गई जो जमीन की खरीद बिक्री से संबंधित विभाग के अधिकारी हैं। कई तो सीधी जिले के बाहर के भी पते वाले खरीददार इसमें शामिल है।

घोटाले पर नजर…
सीधी जिले में सूखा नाला का एक अपना अलग महत्व है इस नाले को यदि जीवनदायिनी नाला कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी लेकिन इस नाले को कुछ शासकीय राजस्व कर्मचारियों एवं भूमाफिया ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया और रेलवे के नाम पर लोगों से धोखाधड़ी करके उसे ही तीन दिवस के अंदर आनन फानन बेंच दिया।

ग्राम नौढिया की आराजी नंबर 1175 रकवा 5.87 एकड़ जो नौढिया और सीधी की सीमा बनाता है ,सूखा नाला के नाम से जाना जाता है, और यह मध्यप्रदेश शासन के भूमि स्वामी स्वत्व की जमीन थी, रिकार्ड आफ लाइट होने के बाद यह जमीन 1974-75 में इसका खसरा नम्बर 535 कर इसके भूमि स्वामी मध्य प्रदेश शासन के स्थान पर मनबोध सिंह तनय देव सिंह हो गए।
मुताविक खसरा नकल वर्ष 2008-09 में इस भूमि के भूमि स्वामी बीरेंद्र सिंह चौहान हो गए, यह इत्तिफ़ाक़ ही हो सकता है कि इसी वर्ष रमेश वर्मा जो नौढिया में पदस्थ हुए और उनके ही प्रतिवेदन पर ही भूमि स्वामी बीरेंद्र सिंह तनय छोटेलाल सिंह दर्ज़ कर दिए गए।कैसे हुए…?क्यों हुए…? यह तो राजस्व विभाग बता सकता है ?
ग्रामीण जनों से पूछताछ के आधार पर बताया गया कि मनोज सिंह और वीरेंद्र सिंह के बीच कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं है किंतु वसीयत के आधार पर तत्कालीन पटवारी रमेश प्रताप वर्मा के द्वारा उनके कार्यकाल में वीरेंद्र सिंह के नाम मनवोध सिंह की सारी भूमियों का एक-एक करके नामांतरण कराया गया जिनके कब्जेदार और वीरेंद्र सिंह के बीच में न्यायालय में मुकदमा लंबित है। आरज़ी नंबर 835 का अंश रकवा का रेलवे में अर्जन हेतु प्रस्तावित था, मुवावजा भी बनाया गया, किन्तु खसरे में नदी दर्ज होने के कारण और पूर्व में म.प्र. शासन दर्ज़ होने की जानकारी होने से तत्कालीन एसडीएम शैलेंद्र सिंह द्वारा रोक लगाई गई थी, भुगतान भी रोका गया था किन्तु किंतु स्थानांतरण उपरांत जाते जाते श्री सिंह ने इसरो को हटाकर तकरीबन 44 लाख रुपए का भुगतान कर दिया। सारे खेल की शुरुआत यहीं से हुई। इस नाले को भूमियों के रूप में प्रचारित किया गया, यह बताया गया कि अभी और भू-अर्जन किया जाना है और यह भूमि भी रेलवे में आने वाली है। और इसका धारा 19 का प्रकाशन होने वाला है।फिर पूरी टीम बनाई गई जिसमें नामांतरण करने के लिए सुवेन्दु सिंह अधीक्षक भू अभिलेख, जमीनों के डायवर्सन हेतु डायवर्सन राजस्व निरीक्षक सुनील द्विवेदी, जिला भूअर्जन लिपिक देवानंद पांडेय सभी को जमीनें दी गई। फिर खेल ऐसा हुआ कि तीन दिवस के अंदर ही 50 से अधिक लोगों के विक्रय पत्र जारी कर दिए गए जबकि खसरे में साफ-साफ खाना नंबर 10 में नदी अंकित है और रजिस्ट्री होने के मौके पर पंजीयक द्वारा क्रेता और विक्रेता दोनों खड़े करके फोटो खींचने का भी विधान है। क्या सारे लोगों ने सूखे नाले को नहीं देखा ? या सूखा नाला के बारे में जानते थे ?
जहां तक विक्रेताओं की बात है ठीक है उन्हें पैसे लेना था किंतु क्रेता के नाम पर जो सारे पढ़े लिखे होशियार और अधिकांश राजस्व कर्मचारी हैं, उनको तो ज़मीन देखनी चाहिए थी, शायद टीम का मायाजाल था किसी ने जमीन देखना उचित नहीं समझा ?

वक्त रहते ही कलेक्टर ने लिया एक्शन….
इस सारे घटनाक्रम में इतना ही अच्छा हुआ कि समय रहते जिला प्रशासन को जानकारी हो गई और कलेक्टर ने समय रहते नामांतरण पर रोंक लगा दी है।

कलेक्टर ने कहा…
इस मामले में जिला कलेक्टर दिलीप कुमार ने स्टार-समाचार से खास बातचीत में बताया कि इस मामले की जानकारी होने पर उन्होंने तत्काल एसडीएम को भेजकर पूरे मामले की जांच कराई तथा जांच उपरांत इस नाले की जमीन को शासकीय दर्ज कराया है तथा इस जमीन पर की गई रजिस्ट्रियों के नामांतरण पर रोक लगा दी गई है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here