अभिमान, अहंकार रूपी विचार, वाणी और आचरण से रहो दूर-मुनिश्री

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आनंद व्यास

गुना। हमेशा अच्छे कार्य एवं विचार करते रहना चाहिए। अभिमान, अहंकार रूपी विचार, वाणी और आचरण से दूर रहना चाहिए। अनेक कथानक आते हैं जिससे स्पष्ट होता है कि अहंकार रूपी विचार आने मात्र से पतन और पाप का आगमन प्रारंभ हो जाता है। अच्छे विचार, वाणी और व्यवहार सदैव रखेंगे तो भावी गति भी सद्गति ही होगी। उक्त धर्मोपदेश जैनाचार्य विद्यासागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री निर्णय सागरजी महाराज ने चौधरी मोहल्ला स्थित पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि अष्ट पाहुड ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है कि कर्म परम निष्पक्ष होते हैं। आप जैसा विचार, वाणी, और आचरण करते हैं उसके अनुसार ही कर्म फल प्रदान करते हैं। प्रत्येक जैन को जिनागम का स्वाध्याय कर स्वयं को धन्य मानना चाहिए। गुनावासियों को तो स्वाध्याय के अवसर सहज उपलब्ध हंै। इस अवसर का सदुपयोग करें। महिला, पुरूष, बालक-बालिका सभी के लिए पाठशाला संचालित हैं। आप इनमें प्रविष्ट होकर स्वध्याय करें। मुनिश्री ने कहा कि पुरूषों का अकलंक एवं निकलंक का चरित्र जरूर पढऩा चाहिए। वहीं महिलाओं को अंजना एवं मैनासुंदरी का चरित्र अवश्य पढऩा चाहिए। दोनों ही चरित्र धर्म के प्रति श्रद्धा को दृढ़ करते हैं।

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