प्रतिबंध के बावजूद जिले मे धड़ल्ले से बिक रही पॉलीथिन

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 सुल्तानपुर से एन टीवी टाइम् संवाददाता अनमोल बरनवाल की रिपोर्ट                                                                                      सुलतानपुर संवाददाता
पर्यावरण को क्षति पहुचाने वाली तथा सूबे में   खरीद और बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध के बाद भी पूरे जिले में पॉलीथिन धड़ल्ले से बिक रही है । यह कहना गलत न होगा कि पॉलीथिन के बिक्री और खरीद के मामले में पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार की राह पर सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार भी चल पड़ी है ।  क्योंकि प्रदेश में पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार ने पॉलीथिन  की खरीद और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया था । हालांकि यह प्रतिबंध एक हप्ते तक ही प्रभावी रहा  । उसके बाद  जो दुर्गति इस कानून की हुई ,शायद उतनी दुर्गति प्रदेश में इसके पूर्व किसी और कानून की नही हुई होगी । पॉलीथिन प्रतिबंध लगाने वाले कानून की उससे अधिक दुर्गति सुल्तानपुर  जिले में योगी आदित्यनाथ सरकार में देखने को मिल रही है
कैसे होगा पर्यावरण का संरक्षण    
पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली पॉलीथिन और डिस्पोजल के खिलाफ समय समय पर अभियान चलते रहे हैं। इसके बाद भी इसे लेकर आमजन में उतनी जागरूकता नहीं आ रही है, जितनी आना चाहिए। ऐसे में पर्यावरण के लिए ये बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। जमीन, जानवर के साथ साथ जनमानस पर इसका दुष्प्रभाव बढ़ता जा रहा है। प्रतिबंध के बावजूद बड़े पैमाने पर धड़ल्ले से अमानक स्तर के पॉलथिन की बिक्री जोरों से चल रही है।
रोक के बाद भी जारी है चलन जिला प्रशासन मौन
न्यायालय के निर्देश पर 40 माइक्रोन से कम मोटाई वाली पॉलीथिन , कैरीबेग बनाने और इसके विक्रय करने पर रोक लगी हुई है। इसके बाद भी बाजारों में ये आसानी से खुलेआम बिक रही है। हालांकि इनकी बिक्री में माल बेचने वालों के साथ ही खरीदारों का भी बड़ा हाथ है। चूंकि मानक स्तर की पॉलीथिन का दाम अधिक है और ये वजन में भी आम पॉलीथिन की तुलना में कम चढ़ती है, जिस कारण लोग थोड़े से पैसे बचाने के लालच में अमानक स्तर की पॉलीथिन ही खरीद रहे हैं, उन्हें इस बात का अहसास तक नहीं है कि तत्कालिक लाभ के चक्कर में वे पर्यावरण के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिसमें दुकानदारों और ग्राहकों पर कार्यवाही करने के बजाय जिला प्रशासन मौन साढ़े हुये है।
बनते हैं अंजान
समाज का शिक्षित वर्ग पॉलीथिन के दुष्परिणाम को भली भांति जानता है। यहां तक कि कुछ लोग जो पालीथिन के विरुद्घ जागरूकता अभियान चलाते हैं। इनमें से ही कई लोग बड़ी शान से पॉलीथिन का उपयोग करते हैं। शिक्षित एवं जानकार लोग पॉलीथिन का जमकर प्रयोग कर रहे हैं।
पशु हो रहे बीमार
कई लोग पालीथिन में घर का कचरा भर कर फेंक देते हैं। जिसमें बड़ी मात्रा में घर का बचा हुआ खाना होता है। इस खाने को कई बार पशु पॉलीथिन सहित खा लेते हैं। इससे पशू के बीमार होकर मरने की संभावना रहती है। पूर्व में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। साथ कई पशु पालीथिन भी खा जाते हैं, जिससे बड़ी संख्या में पशु बीमार होकर मर रहे हैं। जिले में गोलाघाट पुल गोमती नदी के किनारे आदि कई सार्वजनिक क्षेत्रों में पालीथिन का अंबार लगा हुआ है ।
डिस्पोजल से भी नुकसान
बदलते समय के साथ लोगों की पसंद में और वस्तुओं में भी बदलाव आ गया। आधुनिक युग में पुरानी वस्तुओं पर नई वस्तुएं भारी पड़ रही है। वर्षों से चली आ रही पत्तों की पत्तल और दोना का प्रचलन बंद सा हो गया है। इसकी जगह प्लास्टिक से बने दोने और पत्तल लोगों की पहली पसंद बन गए हैं। डिस्पोजल का धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। इस बात की किसी को कोई फिक्र नहीं है कि इससे पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंच रहा है। डिस्पोजल के अत्याधिक चलन से जहां प्रदूषण बढ़ रहा है वहीं नाई समाज के लोगों के समक्ष रोजी रोटी का संकट छा गया है। मजबूरन उन्हें भी अब पत्तों की दोना पत्तल के साथ प्लास्टिक के बने हुए दोना पत्तल बेचने पड़ रहे हैं। प्लास्टिक से बने दोना पत्तल से पर्यावरण तेजी से प्रदूषित हो रहा है। क्योंकि वैवाहिक कार्यक्रमों में लाखों की तादाद में डिस्पोजल उपयोग हो रहे हैं। जिससे जमीन और जानवर को खतरा बढ़ रहा है।
रोजी रोटी पर असर
कई पीढ़ियों से नाई समाज के लोगों की रोजी रोटी के साधन पत्ते के दोना पत्तल हुआ करते हैं। प्लास्टिक के डिस्पोजल आने से उनकी रोजी रोटी पर असर पड़ा है। परिवार के लोग पत्ते तोड़कर इस व्यवसाय में लगे रहते थे और उसी से उनकी रोजी रोटी चलती थी। अब कई परिवारों पर संकट है। ग्रामीण क्षेत्रों तक तेजी से डिस्पोजल का चलन हो गया है।

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