कलेक्टर मिश्र ने महाकालेश्वर मंदिर के चांदी द्वार पर अपने मातहतों के साथ जूते पहनकर पहुचे

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कलेक्टर मिश्र ने महाकालेश्वर मंदिर के चांदी द्वार पर अपने मातहतों के साथ जूते पहनकर पहुचे

शाही सवारी-इतनी भी क्या जल्दी थी      यही कलेक्टर साहब।
वही कलेक्टर साहब और उनके साथी गण जुते पहनकर ही घूम रहे थे

एक मे श्रद्धा भक्ति का जलवा
तो दूसरे में आस्था पर कुठाराघात
भूत भावन बाबा महाकाल की शाही सवारी के अवसर पर उज्जैन जिले के कलेक्टर शशांक मिश्र के दो रूप शहरवासियों को देखने को मिले एक और  कलेक्टर शशांक मिश्रा अवंतिका नाथ की शाही सवारी में नंगे पैर शामिल होकर जनता जनार्दन की प्रशंसा पाई तो दूसरी ओर इन्हीं कलेक्टर मिश्र ने महाकालेश्वर मंदिर के चांदी द्वार पर अपने मातहतों के साथ जूते पहनकर श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट पहुंचाई है इस तरह प्रशासन के आला अधिकारियों ने यह साबित कर दिया है कि हाथी के दांत खाने के कुछ और होते हैं और दिखाने के लिए कुछ और कहीं पर जनता की वाहवाही लूटने के लिए सड़क पर नंगे पैर चलते हैं तो मंदिर में जूतों सहित प्रवेश कर जाते हैं महाकालेश्वर मंदिर परिसर के इतने करीब कोई भी भक्तजन जूते लेकर नहीं पहुंचता है

लगभग सवा 9 बजे बाबा महाकाल अपनी प्रजा का हाल-चाल जानकर वापस मंदिर पहुंच गए। शाही सवारी के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है। बाबा महाकाल का यह सबसे कम समय का भ्रमण कार्यक्रम रहा।
 हालांकि शाही सवारी का टाईम-टेबल जारी किया गया था,पर उनका इतनी प्राथमिकता से पालन होगा कि सबसे बड़े बाबा 1 घण्टा पहले मंदिर लौट आएंगे,किसी को भी उम्मीद नही थी। 
सबके मन मे एक सवाल उठ रहा है इतनी जल्दी क्या थी कलेक्टर साहब।
माना बारिश हो रही थी,भीड़ अपेक्षाकृत कम थी,सवारी मार्ग पर लगे बेरिकेड्स भी दर्शन में बाधा डाल रहे थे, पर श्रद्धालुओं को तो दर्शन करने ही थे। आपके टाईम टेबल को मोबाईल की स्क्रीन पर देखकर भक्त सवारी देखने का स्थान तय करके आ रहे थे। 
तेलीवाड़ा से सवारी पता नही किसके इशारे पर तेजी से चली तो तय समय से 1 घण्टा पहले ही मंदिर लौट आई।
सराफा,छत्रीचौक,पटनी बाजार,गुदरी,महाकाल चौराहे पर लोग आए तो सवारी जा चुकी थी।
इंदौर और आसपास से आने वाले भक्त गुदरी या महाकाल चौराहे का समय साधते है,इस बार उनको घोर निराशा हुई।
प्रशासन का तर्क बारिश के ईर्दगिर्द घूम रहा है, जबकि बारिश और सवारी का पुराना नाता है। एक बार खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह पूरी सवारी में भीगते रहे है। जो भक्त मंडल या सवारी का हिस्सा रहने वाले भक्त है उन्हें अब बारिश की आदत पड़ गई है। 
श्रद्धालुओं को भी बारिश डिगा नही सकी है। फिर क्या जल्दी थी इसकी पड़ताल तो होना चाहिए। 
जो भक्त व्यवस्था की जल्दी से दर्शन नही कर पाए उनको जो आत्मिक पीड़ा हुई है उनका मुआवजा कौन देगा।
सवारी भी इस बार अव्यवस्था का शिकार हुई। प्रशासन का अनुभव कम नज़र आया। 
प्रशासक अवधेश शर्मा आजकल अपने रिलीव ऑर्डर पर ही फोकस कर रहे है। उनकी उदासीनता साफ दिख रही थी।
सवारी में सुरक्षा व्यवस्था अच्छी थी,प्रशासन ने मेहनत भी बहुत की,कोई घटना-दुर्घटना नही हुई,सब कुछ सामान्य रहा। 
शाही सवारी को ठीक से निकालने के लिए प्रशासन को शाबासी मिल सकती थी पर जल्दबाजी ने मजा किरकिरा कर दिया।
साहिबान चौबे बनने गए थे,दुबे बनकर लोटे।
खेर बाबा के जल्दी लौटने से माता पार्वती,गणपति बाबा,कार्तिक जी,और नंदी महाराज जरूर खुश हुए होंगे।

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