बीजापुर। हम सभी जानते हैं कि नक्सली देशद्रोही हैं, राजद्रोही हैं और लोकतंत्र पर विश्वास नहीं करते परंतु वे भी इंसान हैं इसलिए मौत के बाद उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। यही वजह है कि मुठभेड़ के बाद मारे गए नक्सलियों के शवों को हम अपने कंधों पर लादकर कई किमी घनघोर जंगल और पहाड़ियों का सफर तय कर अस्पताल तक लाते हैं ताकि शवों का अंतिम संस्कार उनके परिजन कर सकें। यह कहना है मुठभेड़ में शामिल डीआरजी कमांडर यमन देवांगन का। यमन देवांगन मुठभेड़ में शामिल जवानों की दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे।

 उन्होंने कहा कि युद्ध और आमने-सामने की लड़ाई के दौरान इंसान और इंसानियत नहीं देखी जाती क्योंकि आगे वाला नक्सली हो, आतंकवादी हो या आम इंसान हो जब हम पर हमला करता है तो हमें आत्मरक्षार्थ गोलियां चलानी पड़ती है। यह युद्ध की नीति है, उसके बाद अगर दुश्मन युद्ध में मारा जाता है तो उसका सम्मान भी हमारा कर्तव्य है। डीआरजी में पदस्थ उपनिरीक्षक यमन देवांगन माड़ में चलाए गए नक्सल विरोधी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

 

जब कैम्प पर हमले से पहले जवानों की टीम को दो टुकडिय़ों में बांटा गया तो एक टुकड़ी की कमान उन्हें सौंपी गई थी। यमन ने बताया कि सूचना के आधार पर उनकी टीम घुप्प अंधेरे में इंद्रावती नदी को पार कर अबूझमाड़ के ऐसे घने जंगल में प्रवेश कर चुकी थी जिसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में वे न तो परिचित थे और न ही उनके पास रास्तों की कोई जानकारी थी।

ऐसे में उस कैम्प तक पहुंचना जहां नक्सली युवाओं को ट्रेनिंग दे रहे थे चुनौतीपूर्ण था। बावजूद वे कैम्प तक पहुंच गए। ट्रेनिंग के दौरान नक्सलियों के चिल्लाने की आवाज आ रही थी। उसके बाद वे उसी दिशा में बढ़ गए। उनके पहुंचने से पहले नक्सलियों के संतरी ने आईईडी ब्लास्ट कर दिया। करीब ढाई घंटे तक चले मुठभेड़ में उनकी दोनों टुकडिय़ों ने 10 नक्सलियों को ढेर कर दिया।