नई दिल्ली । लोकसभा 2014 का चुनाव मोदी लहर पर सवार था। 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग 50 फ़ीसदी लोकसभा सीटों में केवल 2 फ़ीसदी वोटों के अंतर से उम्मीदवार जीते थे। वहीं लगभग 24 उम्मीदवार मात्र 1 फ़ीसदी वोटों के अंतर से चुनाव जीते। 2014 में जो मोदी लहर थी वैसे मोदी लहर इस बार देखने को नहीं मिल रही है। पुलवामा के बाद एक बार फिर मोदी के पक्ष में जनसमर्थन बना था। किंतु उसमें वह जोश खरोश नहीं था जो 2014 में देखा गया था। लोकसभा 2019 के चुनाव में यदि 1से 2 फ़ीसदी का भी अन्तर होता है, तो 50 से अधिक सीटों में इसका अंतर देखने को मिल सकता है। भारत के लगभग एक दर्जन राज्यों जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों की लगभग 50 सीटों पर भारी अंतर देखने को मिल सकता है। 50 सीटें मामूली अंतर से 2014 के चुनाव में विजयी सांसदों ने जीती थी।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कड़ी चुनौती मिल रही है। वहीं विपक्षी दल भी आक्रमक होकर भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ सारे देश में मोर्चा खोले हुए हैं। भाजपा के लिए राहत की बात यह है। की पुलवामा में हुई घटना के बाद एक बार फिर राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में रुझान देखने को मिला राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार यह रुझान अब देखने को नहीं मिल रहा है। इसका असर मात्र अभिनंदन के आते तक देखने को मिला था। राम मंदिर को लेकर कुंभ के आयोजन के बाद जिस तरह से हिंदू साधु संतों का विश्वास कमजोर हुआ, और उत्तर प्रदेश की जनता और देश की हिंदू जनता के बीच में भी वह जोश देखने को नहीं मिला, जो बनना चाहिए था। विशेषज्ञों का मानना है। कि 2019 का लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। भाजपा को यदि इस चुनाव में स्थाई बहुमत की सरकार बनानी है। तो ऐसी स्थिति में उसे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी।