Saturday, July 2, 2022
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आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम, मिलिए बेजुबान जिंदगियों, कुदरत की खिदमत में जुटे इन रहनुमाओं से


भोपाल. फिर सुबह होगी फिल्म में साहिर लुधियानवी के लिखे और मुकेश के गाए बेहद मशहूर एक गीत की पहली लाइन है’आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम’. मिलिए जमीं के कुछ ऐसे ही रहनुमाओं से, जिन्होंने भोपाल शहर में अपने-अपने तरीकों से शारीरिक, मानसिक रूप से अपाहिज, बेसहारा लोगों, बेजुबान पशु-पक्षियोंं की जिंदगियों और प्रकृति की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया है.

खास बात यह है कि अपनी जीवन संगिनी के साथ यह काम करने वाले दो जोड़े हैं और एक जोड़ा मामा-भांजी का है, जो लैंगिक समानता का संदेश भी दे रहा है. एक सोच वाले दो लोगों से शुरू हुए इन जोड़ों के कारवां मेंं अब हजारों लोग जुड़ चुके हैं. आइए जानते हैं कौन हैं ये शख्सियतें और कौनसा ऐसा अनूठा काम कर रही हैं, जो दूसरों के लिए प्रेरक है और इन लोगों को खास बनाती हैं.
बेजुबानों की जुबां, बेसहारों का सहारा हैं अयान

भोपाल शहर के अयान का मिशन है बेजुबानों की सेवा. बेजुबान चाहे इंसान हो या पशु पक्षी. अयान के मिशन में सब बराबर हैं, उनके मिशन मेंं भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं. मजहब या भाषा कोई मायने नहीं रखती है. बेजुबानों की जुबां और उनका रहनुमा बनने का अयान का सफर तब शुरू हुआ, जब सड़क पर एक गर्भवती कुतिया को किसी वाहन ने टक्कर मार दी. उस वक्त सड़क पर गिरी वाहन सवार महिला से तो सब हाल पूछ रहे थे, लेकिन लहूलुहान कुतिया की चीख कोई नहीं सुुन रहा था, वह पास की झाड़ी में पड़ी कराह रही थी, पेट में उसके बच्चे मर चुके थे, तब मैंने उसे उठाया और इलाज के लिए लेकर भागा. कुछ दिनों बाद वह चल बसी. अफसोस, मैं उसे बचा नहीं पाया, तबसे मैैंने संंकल्प लिया कि बेजुबानोंं की सेवा के लिए सब कुछ करूंगा. उसी समय से अयान कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैंस, भे़ड़, बकरी, सूूअर, पक्षी सबके लिए मुसीबत में पड़ने पर सूचना मिलतेे ही दौड़ पड़ते हैैं. दिन हो या रात, वक्त नहीं देखते, किसी और की मदद का इंतजार नहीं करते हैं.

अयान के मिशन में मानसिक संतुलन खो बैठे, सड़क किनारे जिंदगी गुजारने वाले ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके शरीर गंदगी से भरे होने या उनके बीमार होने के कारण लोग छूना तक पसंद नहीं करते, डॉक्टर तक ऐसे लोगों से बचना चाहते है . अयान ऐसे लोगों के लिए मसीहा की तरह हैंं. वह अपने साथियों के साथ जाते हैं. ऐसे लोगों को नहलाते, उनकी सफाई करते, दाढ़ी बनातेे, कपड़ेे पहनातेे और खाना खिलाते हैैं. जरूरतमंदों को अस्पताल तक पहुंचाते, उनका इलाज करातेे हैैं. बेजुबान जानवर हो या इंंसान, सबकी मदद के लिए अयान की टीम के सदस्य भोपाल केे हर कोने में मौजूद हैं. अयान के काम को लेकर परिवार केे सदस्य सहज महसूस नहीं करते, लेकिन उनकी भांजी मरियम उनके अभियान में पूरा साथ देती है. मरियम अभी कक्षा 11वीं में पढ़ रही है. महिलाओं की मदद के समय मरियम काम की अगुवाई कर रही होती है.
दो किस्से जो आपको भावुक कर देंगे
अयान अपनी जिंदगी के दो किस्से बताकर दुखी होते है और गर्व भी महसूस करते हैं. बह बताते हैं कि एक बार 5-6 साल का एक भूखा-प्यासा, बीमार हालत में बच्चा उन्हें फुटपाथ पर रोता मिला था. कोई उसे छोड़कर चला गया था. वह कुछ बता भी नहीं पा रहा था. तब उन्होंने इस बच्चे को उठाया, उसे नहला-धुलाकर खाना खिलाया. फिर इलाज के साथ उसके रहने और पढ़ने का इंतजाम किया. मुझे खुशी है कि वह बच्चा आज स्कूल का टॉपर स्टूडेंट हैं.

अयान एक मानसिक विक्षिप्त, घर से ठुकराई और दुष्कर्म की शिकार युवती का किस्सा सुनाते हुए रो पड़ते हैं और बताते हैं कि काफी मशक्कत और इलाज के बाद उसकी दिमागी हालत सुधरने लगी. वह मुझे पापा कह कर पुकारती थी. वह अब इस दुनिया को अलविदा कह चुकी है, लेकिन उसकी जुबां से पापा शब्द भुलाए नहीं भूलता.

पहाड़ पर उगा रहे जंगल
मनोज गौड़, जो पेशे एक फार्मास्युटिकल कंपनी में टेरेटरी मैनेजर के अलावा लाइफ कोच और मोटिवेशन स्पीकर भी हैं. इनकी जीवन संगिनी पूूजा गौड़ हैं. इस जोड़े ने वैसेे तो अब तक भोपाल शहर के विभिन्न इलाकों में 5 हजार पेड़ लगाए हैं, लेकिन वे पिछले कई वर्षों से एक बेहद मुश्किल और रोमांचित करने वाला काम कर रहे हैं.यह काम कि भोपाल की प्राचीन एवं ऐतिहासिक पहाड़ी मनुआ भांड की टेकरी मेें सघन वन विकसित करनेे का हैै. यह इतनी ऊंची पहाड़ी है, कि आप वहां से खड़े होकर पूरे भोपाल का नजारा ले सकते हैं. कुछ वर्षों पहले जब श्री गौड़ ने वहां विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाने का काम शुरू किया था, तब वहां पत्थरों और बंजर जमीन के अलावा कुछ नहीं था, अब वहां हरियाली नजर आने लगी है. पहाड़ी पर अब तक 250 पेड़ लगाए जा चुके हैं. यह गौड़ दंपति के समर्पण और मेहनत का नतीजा है.

पौधों की परवरिश यह बच्चों के समान करते हैं. रोज सुबह शाम अपनी कार की डिग्की में पानी के बड़े-बड़े केन भरकर पहाड़ पर ले जाते हैं और वहां पौधों की सिंचाई करते हैं, क्योंकि टेकरी पर सिंचाई के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है. बता दें कि अब उनके कारवां में करीब 150 लोग शामिल हो चुके हैं, जो पहाड़ के पौधों की परवरिश कर रहे हैं. मनोज गौड़ और उनकी सहधर्मिणी पूजा गौड़ कहते हैंं कि जीवन के लिए ऑक्सीजन जरूरी है, बस इसी बात ने हमें पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया. पौधे लगाने से भी ज्यादा जरूरी है, उसे संरक्षित करना. क्योंकि पौधा जीवित रहेगाा, तभी वृक्ष बनेेगा और उसके लाभ हमें मिल पाएंगे.

मनोज गौड़ भोपाल में पौधरोपण के लिए बने ग्रीन भोपाल ग्रुप के कॉर्डिनेेटर हैं. उन्होंने भोपाल के एतिहासिक कमला पार्क में 200 साल पुुराने बरगद के पेड़ को कटने से बचाने में अपनी अहम् भूमिका निभाई थी.

पिंजरे से पक्षियों की रिहाई का मिशन

धर्मेद्र शाह शहर में कई रेस्तरां संचालित करते हैं और पिछले 25 साल से ‘मिशन पंख’ नामक अभियान चला रहे हैंं. यह अभियान है पिंजरों में कैद पक्षियों की रिहाई का. वह अब तक 20 हजार तोतों को पिंजरों से आजाद करा चुके हैं. लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी उनका नाम दर्ज हो चुका है. लिम्का बुक ने मिशन पंख को पहला ऐसा मिशन माना हैै, जो पिंजरे से मुक्ति और तोतों की आजादी पर काम कर रहा है. धर्मेंद्र शाह के साथ उनकी जीवनसंगिनी जयश्री शाह भी बराबरी से सहयोग कर रही है. धर्मेंद्र बताते हैं कि एलेक्जेंडर पैरेट, जिसे हम कंठी तोता भी बोलते हैं और जिसके गले में पट्टा जैसा होता है, उसकी नस्ल खत्म होती जा रही हैै. अगले 5 साल में यह देखने को नहींं मिलेगा.

mission for help

वे कहते हैं कि बहेलिया जब उन्हें पकड़ता है, तो झुंड के किसी भी तोते को नहीं छोड़ता. तोते पिंजरों में डाल कर अलग-अलग जगह भेज दिए जाते हैं, कई तोते रास्ते मेंं ही मर जाते हैं. कई तोते जंंगल नहीं पहुंच पाते, उनकी जनरेशन वहीं खत्म हो जाती है. यह बहुत दर्दनाक स्थिति है. वह बताते हैं कि तोतों की आजादी का भाव बचपन में ही पैदा हो गया था. मां बाजार से गुजरते बहेलिये को जैसे ही देखती थी तो आवाज देकर उसे रोक लेती. मुझे पैसे देकर कहती कि बहेेलिये से अच्छे से मोल-भाव कर ज्यादा से ज्यादा तोते ले लो. उस समय 50 पैसे का एक तोता मिल जाता था, तो सारे पैैसों से जितने तोते खरीद सकता था, खरीद लेता था. तोतों को खरीद कर वहीं उड़ा देता. 20 साल पहले मां दुनिया में नहीं रहीं, तो मैंने इस काम को जीवन का लक्ष्य बना लिया और ‘मिशन पंख’ नाम दिया.

बाद में उनकी जीवन साथी जयश्री भी अभियान की साथी बन गई है. जहां पिंजरे में पक्षी होने की खबर मिलती, वह भी धर्मेंद्र के साथ टीम मेंबर की तरह जाती और तोतों के दर्द की कहानी सुनाकर उन्हें मुक्त कराने की कोशिश करतीं. बता दें कि धर्मेंद शाह के ‘मिशन पंख’ का चयन केबीसी के अगले सीजन में कर्मवीर कैटेगरी के लिए हुआ है। वह जल्द ही टीवी धारावाहिक सत्यमेव जयते में भी दिखाई देंगे.

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