कुढ़नी विधान सभा उपचुनाव: आखिर क्यों सियासी समीकरण में उलझा हुआ दिख रहा है जदयू?  – kudhani assembly by election jdu stuck in political equation rjd bjp mukesh sani – News18 हिंदी

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पटना/मुजफ्फरपुर. मोकामा और गोपालगंज विधान सभा उपचुनाव को लोकसभा चुनाव के पहले सेमीफाइनल माना जा रहा था. लेकिन, ये मुकाबला भाजपा और महागठबंधन के बीच 1-1 बराबरी पर छूटा और इस मैच से पता नहीं चला कौन जीता कौन हारा. मगर, अब कुढ़नी विधान उप उपचुनाव दोनों गठबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. जानकार मानते हैं कि कुढ़नी विधान सभा चुनाव परिणाम ये भी साफ कर देगा की जिस वोट बैंक पर जदcgयू अभी तक दावा करता रहा है वो उनके साथ कितनी मजबूती से खड़ा है.

दरअसल जदयू और जीत के बीच कुछ उम्मीदवारों ने अड़चन डाल दी है जिससे जदयू परेशान है. इसका कारण यह है कि कुढ़नी का जो सामाजिक समीकरण है उसमें मुस्लिम वोटर भी निर्णायक माने जाते हैं. मुस्लिम वोट अभी तक जदयू, राजद या महागठबंधन के साथ रहा है. लेकिन, इस बार असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने उम्मीदवार उतार कर जदयू के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है. यहां यह भी बता दें कि गोपालगंज में राजद उम्मीदवार को हराने में AIMIM की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी और अब कुढ़नी में इस बार जदयू की जीत की राह कठिन बना रही है.

इसके साथ ही कुछ ऐसी ही परेशानी मुकेश सहनी के उम्मीदवार उतारने पर भी जदयू को हो रहा है. कहा जा रहा है कि बोचहां में भूमिहार मतदाता बीजेपी से नाराज थे. आज भी उनकी नाराजगी दूर पूरी तरह से नहीं हो पाई है. इसी का फायदा जदयू उठाना चाहता है. मोकामा उपचुनाव में भूमिहार वोटों का अधिकांश हिस्सा महागठबंधन को मिला भी था जिसकी वजह से बीजेपी तब हार गई थी. हालांकि, वहां यह भी बड़ी बात थी कि अनंत सिंह और उनका परिवार इस सीट से 6 बार से लगातार जीतता आ रहा है. लेकिन, कुढ़नी में इस बार मुकेश सहनी ने भूमिहार उम्मीदवार देकर जदयू के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है.

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कहा जा रहा है कि अगर भूमिहार वोट में बंटवारा होता है तो इसका खामियाजा जदयू को भी उठाना पड़ेगा. इसी को रोकने के लिए जदयू के राष्ट्रीय प्रेसिडेंट ललन सिंह खद कुढ़नी में कैंप कर रहे हैं. साथ ही जदयू के कई भूमिहार नेता भी कुढ़नी में कैंप कर चुके हैं. वहीं, राजद से नाराज सहनी समाज का एक नेता भी निर्दलीय चुनाव मैदान में है जो सहनी वोट काट सकता है. जाहिर है इसका घाटा जितना बीजेपी को होगा उतना ही जदयू को भी होगा. वहीं मुकेश सहनी के उम्मीदवार उतरने की वजह से सहनी वोट में बंटवारा तय है और इसका सबसे अधिक नुकसान जदयू को ही हो सकता है क्योंकि अति पिछड़ा वोट पर जदयू दावा करता रहा है.

कुढ़नी के चुनाव को नजदीक से जानने वाले बताते हैं कि राजद से टिकट छिन जाने की वजह से राजद के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी निराश हैं और इसका खामियाजा भी जदयू को उठाना पड़ सकता है. हालांकि दूसरी ओर जदयू को उम्मीद है कि तेजस्वी यादव के चुनावी मैदान में उतरने के बाद शायद इनकी नाराजगी दूर हो. लेकिन, वो किस हद तक दूर हो पाएगी ये तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चल पाएगा. वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि राजद से टिकट छिन जाने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी (राजद) के कार्यकर्ताओं में काफी निराशा है. ऐसे में यादव व काफी हद तक कुछ अन्य पिछड़े वर्ग के वोटर इधर-उधर हो सकते हैं. ऐसे में सियासी समीकरण के लिहाज से देखें तो कुढ़नी उपचुनाव में सबके निशाने पर जदयू है.

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