Tuesday, June 28, 2022
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जम्मू-कश्मीरः माता खीर भवानी मंदिर में की गई पूजा-अर्चना, 18000 श्रद्धालु हुए शामिल


श्रीनगर. कहते हैं ईश्वर की आराधना और कुछ नहीं बस अपने अंदर के भय को मुक्त करने का तरीका है. जब इंसान भयमुक्त हो जाता है तो फिर वह बड़े से बड़े फैसले आसानी से कर लेता है. कश्मीर की खूबसूरत वादियों में पिछले कुछ महीनों में फिर से डर का माहौल पैदा किया जा रहा है, खासकर जिस तरह वहां पर कश्मीरी पंडितों सहित गैर मुस्लिम समुदाय पर लक्षित हमले किए जा रहे हैं, सरकारी कर्मचारियों की दिन दहाड़े हत्या की जा रही है. ऐसे में ईश्वर की आस्था और प्रार्थना ही है, जो लोगों को संबंल देने का काम करती है. इसी का उदाहरण देखने को मिला. केंद्र सरकार के मुताबिक जम्मू और कश्मीर के गांदरबल स्थित माता खीर भवानी मंदिर में जहां इस बार ज्येष्ठ अष्टमी के मौके पर करीब 18000 कश्मीरी पंडित और दूसरे श्रद्धालुओं ने उपस्थित दर्ज की.

गांदरबल के तुलमुल्ला में मौजूद खीर भवानी माता मंदिर में हर साल ज्येष्ठ अष्टमी के मौके पर खीर भवानी मेले का आयोजन किया जाता है. जहां जम्मू और कश्मीर के अलग अलग क्षेत्रों से लोग दर्शन के लिए आते हैं. महामारी के चलते पिछले दो साल से यहां मेला आयोजित नहीं हुआ था, इस बार भी आंतकियों ने जिस तरह का माहौल पैदा कर दिया है उसके बाद मेले को लेकर कई संशय थे, लेकिन .साथ ही इस बार मेले का मकसद सांप्रदायिक सौहार्द्रता कायम करना था. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ट्वीट करते हुए कश्मीरी पंडितों को ज्येष्ठ अष्टमी की बधाई दी.

क्या है खीर भवानी मंदिर का इतिहास
पौराणित कथाएं कहती है कि श्रीनगर जिले के तुलमुल्ला में चिनार के पेडों के बीच स्थापित खीरभवानी मंदिर रागनी देवी (दुर्गा देवी का एक रूप) का मंदिर है. रावण रागनी देवी का अनन्य भक्त था लेकिन उसके दुष्कर्मों से देवी जी नाराज हो गई थी, इस तरह जब राम जी की वनवास की अवधि पूरी हुई तो उन्होंनें हनुमान को देवी के मंदिर को स्थानान्तरित करने के लिए कहा था, हनुमान मंदिर को तुलमुल्ला लेकर आए थे. वहीं इतिहास बताता है कि मूल मंदिर का निर्माण 1912 में महाराणा प्रताप सिंह ने करवाया था, बाद में महाराजा हरिसिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया. कश्मीरी हिंदु में अधिकांश इन्हें अपनी कुलदेवी के तौर पर पूजते हैं.

मंदिर का झरना और पानी का बदलता रंग
श्रीनगर से 27 किमी दूर स्थित इस मंदिर के पास एक झरना है, जिसके पानी को लेकर यहां के लोगों की मान्यता है कि इसका पानी आने वाली विपत्ति के अनुसार अपना रंग बदल लेता है. कहा जाता है कि 2014 में जब कश्मीर में बाढ़ आई थी तो झरने का पानी काला हो गया था. इस झरने के पानी को लाल, नारंगी, गुलाबी, हरे नीले और सफेद रंग में बदलने के लिए जाना जाता है. 1886 में ब्रिटिश सरकार के कमिश्नर वॉल्टर लॉरेंस ने बसंत की अपनी यात्रा के दौरान इसके पानी के बैंगनी होने की सूचना दी थी.

खीर भवानी मेले को भी मिल चुकी है धमकी
आंतकवाद और 1990 में हुए हिंदु पलायन के दौरान मेले को भी धमकी दी गई थी. लेकिन गांदरबल में भारतीय सेना के समर्पित प्रयासों के चलते इस पर आंच नहीं पड़ी. यह कश्मीर के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां गंभीर आंतकवादी खतरों के बावजूद हिंदु पुजारियों ने कभी मंदिर नहीं छोड़ा.

खीर का चढ़ता है प्रसाद
मंदिर को लेकर मान्यता है कि खीर के भोग से देवी मां प्रसन्न हो जाती है, इसलिए यहां भोग में खीर का प्रसाद चढ़ाया जाता है. इसी के चलते इसका नाम खीर भवानी माता पड़ा.

मंदिर कैसे पहुंचा जाए
जम्मू-कश्मीर से बाहर रहने वालों के लिए यहां सड़क, रेल और हवाई तीनों मार्ग उपलब्ध हैं. लेह, जम्मू, दिल्ली, मुंबई और चंड़ीगढ़ जैसे शहरों से यहां आने के लिए फ्लाइट उपलब्ध रहती है, सबसे निकटतम हवाई अड्टा श्रीनगर है. मंदिर के नजदीक का रेल्वे स्टेशन भी श्रीनगर ही पड़ता है. इसके अलावा अब यहां सड़क मार्गे से आना भी सुगम हो गया है. मंदिर की श्रीनगर से दूरी करीब 14 किमी है. राष्ट्रीय राजमार्ग 1 ए और 1 डी जो श्रीनगर से जुड़े हैं, उसके जरिए आसानी से मंदिर पहुंचा जा सकता है.

Tags: Jammu kashmir



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