Saturday, July 2, 2022
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दास्तान-गो : ईसाईयत का ज़वाब ‘बिरसाईयत’, ‘उलगुलान’ से भगवान… नाम- बिरसा मुंडा


दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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महज 25 बरस की उम्र में कोई शख़्स इंसान से भगवान हो सकता है. इसकी एक जागती मिसाल है- बिरसा मुंडा. अंग्रेजों के ज़माने की बात है ये. तब बंगाल प्रेसिडेंसी के छोटा नागपुर (अभी झारखंड का हिस्सा) में 15 नवंबर को 1875 को सुगना (पिता) और कर्मी हातू (मां) मुंडा के घर उनके बेटे ने जन्म लिया. बच्चे की पैदाइश का गांव उलिहातू हुआ या चालकद, इसे लेकर कहीं-कुछ दो-राय है. हालांकि उलिहातू को जानने-मानने वाले ज़्यादा होते हैं. मग़र कहते हैं कि बचपन इस बच्चे का बीता चालकद में, जहां उसके दादी-दादा रहते थे. बड़े-बुज़ुर्गों ने नाम रखा उसका ‘बिरसा’, मतलब ‘सक्षम’. और सही मायनों में आगे वह हर तरह से सक्षम साबित हुआ. साबित क्या हुआ, अपने जैसे तमाम लोगों को सक्षम बनाने की गरज़ में इस मायने से बहुत आगे निकल गया.

ये दौर था, जब अंग्रेज हिन्दुस्तान के जल, जंगल, ज़मीन का बुरी तरह दोहन कर रहे थे. मुल्क़ के तमाम भीतरी इलाकों में मौज़ूद परंपरागत ग्रामीण व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर रहे थे. इन्हीं में एक थी ‘खूंटकट्‌टी’. मुंडा आदिवासियों के बीच प्रचलित इस व्यवस्था में पूरा समुदाय मिलकर जंगल के किसी इलाके को साफ करता था. उसे खेती के लायक बनाता. मिलकर खेत-जोत करता. पूरे कबीले का उस ज़मीन पर हक़ होता था, न कि किसी एक शख़्स या ख़ानदान का. लेकिन अंग्रेजों ने उस दौर में जो ज़मींदारी-व्यवस्था लागू की, उसने सीधे ऐसी तमाम परंपरागत प्रणालियों की जड़ों पर चोट की थी. बड़े पैमाने पर ग्रामीण हिन्दुस्तानी आबादी तिलमिलाई हुई थी, इससे. ज़ाहिर तौर पर जल, जंगल और ज़मीन को ही सब कुछ मानने वाले मुंडा आदिवासी भी इसी हाल में थे.

ज़मींदारी व्यवस्था आदिवासियों को ज़मीन मालिक से बेग़ारी, बंधुआ मज़दूरी पर आश्रित समुदाय बना रही थी. आदिवासियों के सरदार लगातार इसका विरोध किया करते. वे अहिंसक तौर-तरीकों के ज़रिए सरकार से आदिवासियों के हुक़ूक वापस मांगा करते थे. तारीख़ में यह क़वायद ‘सरदारी लड़ाई’ के नाम से दर्ज़ है. हालांकि इस लड़ाई का सरकार पर कोई ख़ास असर होता न था. इसके अलावा अंग्रेज सरकार आदिवासियों पर एक और ज़ुल्म ढा रही था, उनके मज़हब को छीनने, बदलने का. बड़ी तादाद में ईसाई मिशनरियां डर दिखाकर, लालच देकर, आने वाले वक़्त के सब्ज़बाग पेश कर मासूम आदिवासियों को अपने मज़हब में शामिल कर रही थीं. गोया कि वे मिशनरियां हिन्दुस्तान की ज़मीन पर थीं ही इसी मक़सद से. इस वज़ह से भी हर तरफ़ बेचैनी का आलम था.

इस माहौल में बिरसा ने पैदाइश पाई और अब वह बड़ा हो रहा था. बड़ा होते-होते जब स्कूल जाने को हुआ तो उसे जर्मन मिशन स्कूल में दाख़िला लेने के लिए ईसाई बनना पड़ा. मुमकिन है, बड़े-बुज़ुर्गों का कोई दबाव रहा हो उस पर क्योंकि इस स्कूल में दाख़िला लेने के थोड़े वक़्त बाद ही उसे इल्म हो गया कि उससे बड़ी ग़लती हो गई है. तालीम देने की आड़ में ईसाई मिशनरियों ने उसे और उसके जैसे तमाम लोगों को अपने चंगुल में फंसा लिया है. लिहाज़ा इस चंगुल से निकलने के लिए छटपटाने लगा वह. और कुछ वक़्त बाद निकल भी गया. ख़ुद ‘सक्षम’ (बिरसा) था न, शायद इसलिए. लेकिन उसके क़बीले के बहुत से लोग उसकी तरह सक्षम नहीं थे. लिहाज़ा उसने बीड़ा उठाया, उन्हें हर तरह से सक्षम बनाने का. और सिर्फ़ बीड़ा नहीं, हथियार भी उठाए, मुक़ाबले के लिए.

दरअसल, बिरसा अब तक यह देख चुका था कि ‘सरदारी लड़ाई’ के तौर-तरीकों का कोई ख़ास असर हो नहीं रहा है सरकार पर. इसीलिए उसने ‘उलगुलान’ छेड़ा. हथियारबंद क्रांति. नारा दिया, ‘सिरमारे फिरुन राजा जय’ यानी ‘पैतृक राजा की जीत हो.’ बिरसा का यह आह्वान उसके जैसे तमाम लोगों को पसंद आया. झुंड के झुंड वे उसके साथ जुड़ने लगे. एक फौज़ सी बन गई अब बिरसा की. यह वक्त था 1894 का. इसी वक़्त के आस-पास हिन्दुस्तान के कई इलाकों में भीषण अकाल पड़ा था. उसके नतीज़े में भुखमरी, महामारी फैली. हज़ारों लोग मौत के मुंह में समा गए. तब सरकार तो ‘सरकार’ न बन सकी पूरी तरह. लेकिन बिरसा और उसके साथी अपने लोगों के लिए ‘भगवान’ बन गए. हर तरह से मदद की उन लोगों ने मुश्किलों से जूझते हुए लोगों की.

birsa munda death anniversaryनतीजतन बिरसा के ‘भक्तों’ की तादाद और बढ़ गई अब. भक्ति ऐसी कि बताते हैं, बिरसा को लोग अब सीधे जोहार (नमस्कार का तरीका) भी नहीं करते थे. बल्कि जिस जगह वे बैठते, ध्यान करते, उस स्थान को प्रणाम करते और चूमते थे. बिरसा ने अब तक ईसाईयत के ज़वाब में एक अलग पंथ ‘बिरसाईयत’ शुरू कर दिया था. उस पंथ को अपनाने-मानने वालों की तादाद भी बढ़ रही थी. साथ ही ‘भगवान बिरसा’ पर आदिवासियों का भरोसा बढ़ता जाता था कि वे ‘दिकुओं’ (बाहरी लोग, अंग्रेज) से उन्हें मुक्ति दिलाएंगे. उनके जल, जंगल, ज़मीन उन्हें वापस मिल जाएंगे. इसीलिए ‘भगवान बिरसा’ का अब एक और नाम ‘धरती आबा’ (धरती का पिता) हो चुका था.

इस सबकी वज़ह एक ये भी हुई कि बिरसा अब तक कई बार सादे तीर-कमान से लैस साथियों के साथ अंग्रेज सिपाहियों की बंदूकों को ख़ामोश कर चुके थे. कहते हैं, बिरसा और उनके साथियों का अंग्रेजों से हथियारबंद टकराव का सिलसिला यही कोई तीन-चार साल चला. इसमें अक़्सर बिरसा की फौज़ ही भारी पड़ी. इससे परेशान अंग्रेजों ने बिरसा को पकड़ने की कई मर्तबा कोशिशें कीं लेकिन नाक़ामयाब रहीं. बताते हैं कि ऐसे ही बिरसा एक बार संकरा गांव में कहीं ठहरे थे. तभी अंग्रेज सिपाही वहां आ धमके. लोगों से बिरसा के बारे में पूछताछ करने लगे. बिरसा ख़ुद वहीं इमली के पेड़ के नीचे बैठकर मांदर बजा रहे थे. कुछ सिपाही उन तक भी पहुंचे. बिरसा ने अपनी सूझ और सहजता से उन्हें ग़ुमराह कर दिया. सिपाही लौट गए. कोई उन्हें पहचानता जो नहीं था तब. क्योंकि बिरसा के साथी, समर्थक हर लम्हा, हर मौके पुख़्ता कर के चला करते थे कि उनके ‘भगवान’ की पहचान ‘दिकुओं’ तक न पहुंचे. सिर्फ़ उनका नाम ही गूंजे उनके कानों तक.

ऐसे में, अंग्रेजों ने ‘फूट डालो’ का जाना-समझा नुस्ख़ा आज़माया. ये साल हुआ 1900 का. फरवरी का महीना था, जब अंग्रेजों को अपने नुस्ख़े से क़ामयाबी मिली और बिरसा को ग़िरफ़्तार कर लिया गया. कोई-कोई बताते हैं कि जब उन्हें पकड़ा गया तो वे संकरा गांव में ही थे. जबकि कहीं यह भी कहा जाता है कि वे चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगलों में किसी जगह पर थे. पर वे पकड़े गए. पुलिस उन्हें रांची ले आई. वहीं उन पर मुक़दमा चला और दो साल क़ैद-ए-बा-मशक़्क़त की सज़ा हुई. रांची की ही जेल में उन्हें रखा गया था. बताते हैं, वहीं उन्हें अंग्रेजों ने ज़हर दे दिया. उनकी हालत बिगड़ी तो एक जून को डिप्टी कमिश्नर ने ऐलान किया कि बिरसा को हैजा हो गया. उनके बचने की उम्मीद नहीं है. और फिर सच में नौ जून की तारीख़ को ‘भगवान बिरसा’ अपने धाम लौट गए. हालांकि उनका नाम, उनके काम, उनकी ‘बिरसाईयत’ की सीख के निशान अब भी धरती पर मौज़ूद हैं.

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