Saturday, June 25, 2022
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दास्तान-गो : मैं डोनाल्ड… डोनाल्ड फॉन्टलिरॉय डक, पूरा नाम… नाम तो सुना ही होगा


दास्तान-गो : किस्से-कहानियां कहने-सुनने का कोई वक्त होता है क्या? शायद होता हो. या न भी होता हो. पर एक बात जरूर होती है. किस्से, कहानियां रुचते सबको हैं. वे वक्ती तौर पर मौजूं हों तो बेहतर. न हों, बीते दौर के हों तो भी बुराई नहीं. क्योंकि ये हमेशा हमें कुछ बताकर ही नहीं, सिखाकर भी जाते हैं. अपने दौर की यादें दिलाते हैं. गंभीर से मसलों की घुट्‌टी भी मीठी कर के, हौले से पिलाते हैं. इसीलिए ‘दास्तान-गो’ ने शुरू किया है, दिलचस्प किस्सों को आप-अपनों तक पहुंचाने का सिलसिला. कोशिश रहेगी यह सिलसिला जारी रहे. सोमवार से शुक्रवार, रोज… 

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हैलो! कैसे हो आप? मैं डोनाल्ड… डोनाल्ड फॉन्टलिरॉय डक, पूरा नाम. नाम तो सुना ही होगा? क्या बात करते हो? नहीं सुना? चलो, कोई बात नहीं. आप होगे दुनिया के कोई अनोखे-लाल. वरना, तो दुनियाभर के तमाम लोग जानते ही हैं मुझे. पहचानते भी हैं अच्छी तरह. अच्छा ये बताओ, मेरी कहानी सुनोगे? बड़ी दिलचस्प है? आप जैसे अनोखे-लालों को भी मज़ा आ जाएगा. आख़िर मैं हूं ही इतना मज़ेदार. क्या कहते हो?… हां?. तो ठीक है फिर, सुनो. लेकिन पहले मैं बताए देता हूं. बीच में कोई बेवकूफ़ाना सवाल या हरक़त मत करना. नहीं तो सिर फोड़ दूंगा. पूरी दुनिया जानती है. गुस्सा बहुत जल्दी आता है मुझे. और एक बार जब आ जाता है न, तो फिर मैं किसी की नहीं सुनता. बस, डेज़ी को छोड़कर. लेकिन आप तो डेज़ी को भी नहीं जानते होगे. अरे, मोहब्बत है वो मेरी. ‘डेज़ी डक’, पूरा नाम है उसका. वो हमेशा इतने प्यार से समझाती है मुझे, कि तुरंत समझ में आ जाता है. और उसकी मोहब्बत की छुअन से गुस्सा ठंडा हो जाता है मेरा.

मग़र इस वक़्त तो वह यहां है नहीं. बाज़ार गई हुई है. आज मेरा जन्मदिन है न. तो शाम की पार्टी के लिए कुछ इंतज़ाम करने गई है. साथ में उसके मेरी जुड़वां बहन डंबेला भी गई है. बिल्कुल मेरी तरह दिखती है. और हां, वे तीन बदमाश. भतीजे मेरे. ह्वुई, ड्वुई और लुई. इतने नटखट हैं कि पूरे दिन नाक में दम किए रहते हैं. उनकी बदमाशियों से और गुस्सा आ जाता है मुझे. वो तो डेज़ी बीच में आ जाती है. नहीं तो, एक दिन में उन तीनों बदमाशों की अक्कल ठिकाने लगा दूं मैं. सच्ची. ख़ैर छोड़ो, वे तीनों भी इस वक़्त बाज़ार गए हुए हैं. इसलिए सुक़ून है थोड़ा. अभी आराम से मैं आपको अपनी कहानी सुना सकता हूं. अच्छा, पहले ये बताओ, वॉल्टर एलियस डिज़्नी का नाम सुना है आपने?… क्या? नहीं सुना? अरे, ग़ज़ब करते हो यार. वॉल्ट डिज़्नी को कौन नहीं जानता. अमेरिका के बहुत बड़े फिल्म प्रोड्यूसर हुए हैं. एनीमेशन की दुनिया में डंका बजता है इनका. मेरे जैसे तमाम कार्टून क़िरदार इन्हीं के ज़ेहन की उपज कहे जाते हैं. समझे?

अच्छा, फ़िर तो आप मिकी माउस को भी नहीं जानते होगे? क्या कहा? जानते हो, मिकी माउस को!.. शुक्र है भगवान का. कुछ तो पता है, हम लोगों के बारे में आपको. बहरहाल, मैं बताऊं आपको ये मिकी माउस बहुत अच्छा दोस्त है मेरा. बहुत समझदार क़िस्म का. पर मुझे अचरज है कि अगर आप उसे जानते हो, तो मुझे कैसे नहीं? मैं तो अक़्सर ही कार्टून की दुनिया में उसके साथ-साथ नज़र आता हूं. कहीं भी, किस भी शो के बीच घुस जाता हूं… ही, ही, ही…, क्या करूं सब्र ही नहीं होता. एक मिनट, एक मिनट. क्या बताया आपने? आपने मिकी माउस को देखा नहीं सिर्फ़ सुन रखा है, उसके बारे में? हद है यार! कौन सी दुनिया में, किस ग्रह में रहते हो आप? इसी धरती पर पाए जाते हो या चांद, मंगल से सीधे उतरकर आ गए यहां मेरे पास? अब तो मुझे सोचना पड़ रहा है कि मैं आपको अपनी कहानी बताऊं भी या नहीं. अच्छा चलो, एक सवाल का ज़वाब और दो. देखो, सोचकर बताना. अगर ‘न’ बोल दिया न, तो सब्र टूट जाएगा मेरा फिर.

सर डोनाल्ड जॉर्ज ब्रेडमैन का नाम सुना है?… अरे, इतना सोचने की ज़रूरत नहीं है. क्रिकेट तो देखा ही होगा? ये क्रिकेट वाले ही सर डॉन ब्रेडमैन हैं. ये पूरा नाम है उनका. एक बार यही डॉन ब्रेडमैन अपनी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम को लेकर अमेरिका आए थे. निजी दौरे पर. ये बात हुई 1932 की. उसी दौरान उत्तरी अमेरिका में उनकी टीम का मुक़ाबला हो गया न्यूयॉर्क वेस्टइंडियन से. उस मैच में सर डोनाल्ड हो गए ‘डक’. यानी शून्य पर आउट हो गए. और क्रिकेट में जब कोई शून्य पर आउट हो जाता है उसे ‘डक’ होना कहा जाता है. उस वक़्त सर डोनाल्ड का क्रिकेट में ख़ूब नाम हो चुका था. इसलिए जब वे अदना सी टीम के सामने ‘डक’ हुए तो अख़बारों में खूब छपा ‘डोनाल्ड डक’. और उसी वक़्त अपने वॉल्ट डिज़्नी के ज़ेहन में जा छपा ‘डोनाल्ड डक’. वे तब अपने समझदार मिकी माउस के दोस्त के तौर पर उससे उलट यानी कोई ऊबड़-खाबड़ सा कार्टून क़िरदार तलाश रहे थे. तो इस तरह उनके दिमाग़ में आ गया ‘डोनाल्ड डक’, यानी कि मैं.

अब आप पूछ सकते हो कि ऊबड़-खाबड़ क़िरदार क्यों?… नहीं यार, आप मत ही पूछो. मैं ख़ुद बताए देता हूं. सीधा सा ज़वाब है. अपना मिकी माउस तो समझदार था ही न पहले से. तो, उसके उलट क़िरदार काम करता न उस वक़्त, है कि नहीं? बस, इसीलिए. हालांकि मेरा दिल बहुत साफ-सुथरा है, समझे न? बहरहाल, क़िरदार दिमाग में आने के बाद उसे कागज़ पर उतरना चाहिए था. तो इसका ज़िम्मा दिया गया चार्ल्स अल्फ्रेड तैलियाफेरो, कार्ल बार्क्स और डॉन रोसा को. इनमें से तैलियाफेरो ने जो ख़ाका खींचा, कहते है, वहीं फाइनल हुआ फिर. उन्होंने मुझे नाविक की ड्रेस पहनाई. हम ‘डक’ लोग पानी में नाविक की तरह तैरते रहते हैं, इसलिए. मुझे कैप भी लगाई और बढ़िया टाई पहनाई. मक्खी जैसी दिखने वाली होती है न जो, वही वाली. पर न जाने क्यों चड्‌ढी नहीं पहनाई. आज तक साला, ऐसे ही रहना पड़ रहा है उनकी एक लापरवाही की वज़ह से. बिना चड्‌ढी के. उन्हें जूते भी नहीं मिले मेरे पैरों के नाप के. नंगा ‘डक’, नंगे पैर घूमता रहता है पूरे समय.

Donald Duck

ख़ैर छोड़ो, जो हुआ सो हुआ. अब बनाने वाले को कोई क्या ही दोष दे. तो इस तरह, जब डिज़ाइन तैयार हो गया मेरा, तो फिर ये मसला आया कि आवाज़ कौन निकाले मेरी तरह. तब ये काम किया क्लैरेंस नैश ने. आवाज़ के बहुत शानदार फ़नकार थे. तरह-तरह की आवाज़ें निकाल लिया करते थे. उन्होंने मेरे ऊबड़-खाबड़ क़िरदार के मुताबिक ग़ज़ब की आवाज़ निकाली. और इस तरह जब पूरी तैयारी हो चुकी तो वॉल्ट डिज़्नी ने मुझे लोगों के सामने पेश कर दिया. एक फिल्म बनाई ‘द वाइज़ लिटिल हैन.’ उसमें पहली बार मुझे शामिल किया. वह तारीख़ हुई नौ जून 1934 की. हालांकि इससे कुछ पहले जब इस फिल्म के प्रचार के लिए विज्ञापन आ रहे थे तो मई महीने में ‘गुड हाउसकीपिंग’ नाम की पत्रिका ने मेरी झलक छाप दी थी. मग़र इतने भर से लोग मेरे बारे में ज़्यादा अंदाज़ा लगा नहीं पाए. वो तो जब फिल्म पर्दे पर आई, तब उन्हें मेरे हुनर का पता चला. फिर ‘ऑरफंस बेनेफिट’ फिल्म आई. पहले 1934 में ब्लैक एंड व्हाइट, फिर 1941 में रंगीन.

इस दूसरी फिल्म में ‘मिकी माउस’ के दोस्त की तरह मैं पहली बार पर्दे पर आया. इसके एक बरस बाद यानी 1942 में मेरे अपने नाम की फिल्म आ गई ‘डोनाल्ड गैट ड्राफ्टेड’. और उसके बाद तो जो हुआ न ज़नाब, दुनियाभर की तारीख़ में दर्ज़ है मेरा नाम. मसलन- अगले ही साल मतलब 1943 में मेरी एक फिल्म आई ‘डोनाल्ड डक इन नाज़ीलैंड’. उसने एनीमेशन की श्रेणी का ऑस्कर अवॉर्ड जीत लिया. इसके बाद पैदाइश के महज़ छह साल के भीतर ही मैं अपने दोस्त ‘मिकी माउस’ से कहीं ज़्यादा कार्टून शो में नज़र आ चुका था. इनमें 128 तो उसके साथ वाले ही थे. एक ख़ास बात ये भी है कि मैं वॉल्ट डिज़्नी के कार्टूनों की दुनिया का इकलौता क़िरदार हूं, जिसे नामकरण में बीच का नाम भी मिला है. मैं अब तक कई फीचर फिल्मों में नज़र आ चुका हूं. इतनी कि डिज़्नी के कोई भी कार्टून मेरे बराबर की तादाद में फ़िल्मों में नहीं दिखे. मेरी अपनी सीरीज़ बन चुकी हैं कई. और जैसा पहले बताया था न, दूसरे कार्टून क़िरदारों के बीच भी जा घुसता हूं.

अब क्या करूं यार. डायरेक्टर बोलते हैं तो करना ही पड़ता है. लोग मुझे पसंद ही इतना करते हैं. वैसे, पसंद से याद आया. ‘टीवी गाइड’ नाम की मीडिया कंपनी ने 2002 में अब तक के सबसे लोकप्रिय कार्टून क़िरदारों की एक फ़ेहरिस्त बनाई थी. उनमें दुनियाभर के कार्टूनों के बीच मेरा नाम ऊपर के 50 पायदानों में शुमार था. ऐसा और भी बहुत कुछ है मेरे ख़ाते में. इसीलिए शुरू में ही मैंने कहा और पूछा था आप से कि ‘नाम तो सुना ही होगा…’ आऐं! ये क्या? ये आदमी तो सो ही गया. इतनी देर से मैं इसे अपना इतना शानदार क़िस्सा सुनाए जा रहा हूं और ये है कि सो रहा रहा है. ओए! उठ. उठ, वरना खींच के दूंगा एक रापटा. निकल यहां से. अभी के अभी. साले, तुझे मेरी क़द्र ही नहीं है, तो यहां कर क्या रहा है तू, इतनी देर से. चल फूट.

‘डोनाल्ड! डॉन! माय बेबी! किस पे गुस्सा कर रहे हो इतना? और ये कौन निकलकर गया है यहां से अभी-अभी? तुमसे कहा था न, जब तक मैं लौटकर न आ जाऊं किसी झगड़ा-फ़साद मत करना’, ‘मैंने कुछ नहीं किया है, डेज़ी. वो आया था मेरे पास. पता नहीं क्या पूछने, बताने के लिए. मैंने उससे चार चीज़ें पूछीं अपने बारे में तो उसे कुछ पता नहीं है. मेरा दिल पसीज़ गया, तो उसे समझाने की गरज़ से मैंने दिल लगाकर अपनी पूरी कहानी सुनाई. पर वो तो क़िस्सा सुनते-सुनते सो ही गया. बेवक़ूफ़, कहीं का. पता नहीं कहां-कहां से आ जाते हैं लोग….’, ‘अच्छा, चलो कोई बात नहीं. छोड़ो उसे. शांत हो जाओ. हम लोग अब तुम्हारे जन्मदिन की शाम की पार्टी की तैयारी करते हैं.’

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