Tuesday, June 28, 2022
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महाराष्‍ट्र का सियासी संकट ऐसे हो सकता है दूर? जानें क्‍या कहता है दल बदल विरोधी कानून


नई दिल्‍ली. महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में जारी राजनीतिक संकट (political crisis) और सरकार के गिर जाने के खतरे के बीच बागी विधायकों की वैधता पर बहस छिड़ी हुई है. ये बागी विधायक शिवसेना (Shivsena) नेता और सरकार में मंत्री एकनाथ शिंदे के साथ फिलहाल असम में डेरा डाले हुए हैं. एकनाथ शिंदे का दावा है कि उनके पास 40 से अधिक विधायकों का समर्थन है. इधर, शिवसेना ने भी अपने विधायकों को चेतावनी दी है कि वह उन पर दल बदल विरोधी कानून (Anti Defection Law)  के तहत कार्रवाई कर सकती है.

इस तमाम बयानबाजी के बीच दल बदल विरोधी कानून को ऐसे समझा जा सकता है, साथ ही इस कानून का एकनाथ शिंदे और उनके साथी बागी विधायकों के लिए क्‍या अर्थ है. सियासी संकट के हल के लिए दल बदल विरोधी कानून क्‍या भू‍मिका निभा सकता है? सरकार इसको लेकर कार्रवाई कर सकती है.

दलबदल विरोधी कानून क्या है?

दलबदल विरोधी कानून, ऐसा कानून है जो एक पार्टी छोड़कर दूसरे में शामिल होने वाले सांसद/ विधायक को अलग-अलग दंडित करता है. हालांकि, सांसदों/विधायकों का समूह यदि किसी अन्‍य राजनीतिक दल में शामिल (विलय) करता है तो उस पर दंड की कार्रवाई नहीं होती है. साथ ही यह कानून दल बदल करने वाले विधायकों को प्रोत्साहित करने या स्वीकार करने के लिए पार्टियों को दंडित नहीं करता है. दरअसल, दल-बदल विरोधी कानून का उद्देश्य, दल बदलने से विधायकों को हतोत्साहित करके सरकार को सुचारू रूप से और स्थिरता के साथ चलाना सुनिश्चित करना था. एक समय 1967 के आम चुनावों के बाद कई राज्य सरकारों को विधायकों के दल-बदल के जरिए गिरा दिया गया था. इस कानून के प्रावधानों को 1985 में दसवीं अनुसूची के रूप में संविधान में जोड़ा गया था जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे.

एक दोष कैसे तय किया जाता है?

दलबदल विरोधी कानून के तहत तीन तरह के स्थिति की गुंजाइश बताई गई है. पहला तब होता है जब विधायक, जो किसी एक पार्टी के टिकट पर चुने जाते हैं, वे ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ देते हैं’ या पार्टी व्हिप की अवहेलना करते हैं. मूल रूप से, दसवीं अनुसूची में उन मामलों में विधायकों की अयोग्यता का प्रावधान था जहां पार्टी की कुल संख्या का 1/3 से कम हिस्सा टूट गया, या जहां एक विधायक दल के 2/3 से कम विधायकों का किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो गया हो. 2003 में हुए एक संशोधन के बाद, एक तिहाई विभाजन प्रावधान हटा दिया गया था.

दूसरी स्थिति में, एक बहस शुरू हो सकती है, जब सदन के एक स्वतंत्र सदस्य के रूप में निर्वाचित सांसद/विधायक आगे बढ़कर किसी पार्टी में शामिल हो जाते हैं.

तीसरा स्थिति मनोनीत विधायकों से संबंधित है जिसमें कानून स्पष्ट है कि वे सदन में नियुक्त होने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो सकते हैं, न कि इतने समय के बाद. इन तीन स्थिति के उल्लंघन के कारण दलबदल कानून के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है और ऐसे मामलों में निर्णय लेने वाले विधायिका के पीठासीन अधिकारी (स्‍पीकर, चेयरमैन) होते हैं. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, विधायक पीठासीन अधिकारियों के फैसलों को उच्च न्यायपालिका के समक्ष चुनौती दे सकते हैं.

क्या इस कानून ने विद्रोहों को रोका और सरकारों को और अधिक स्थिरता दी है?

इस कानून को लेकर मंशा तो नेक थी, लेकिन यह कानून उन सभी उद्देश्‍यों की पूर्ति करने में नाकाम रहा, जिसके लिए इसे लाया गया था. इस कानून ने ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ नामक नया पॉलिटिक्‍स कॉन्‍सेप्‍ट पैदा कर दिया. इसमें पार्टियां अपने विधायकों को हॉर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए रिसॉर्ट में ले जाती हैं. इस कॉन्‍सेप्‍ट पर ताजा स्थिति में एकनाथ शिंदे के विधायकों को गुजरात के सूरत और फिर असम ले जाया गया. इससे पहले राजस्थान (2020), महाराष्ट्र (2019), कर्नाटक (2019 और 2018), और तमिलनाडु (2017) में भी यही तरीका अपनाया गया था.

कानून में सुधार के लिए कोई सुझाव?

केशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष मणिपुर के 2020 मामले में न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन कानिर्णय दलबदल विरोधी कानून के लिए महत्वपूर्ण रहा है, जहां न्यायमूर्ति नरीमन ने दलबदल के मामलों से निपटने के लिए एक बाहरी तंत्र स्थापित करने की बात कही थी. पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सुझाव दिया कि इसे केवल अविश्वास प्रस्ताव में सरकारों को बचाने के लिए ही लागू होना चाहिए. वहीं, चुनाव आयोग के अनुसार, पक्षपात की शिकायतों से बचने के लिए दल-बदल मामलों में निकाय को निर्णायक प्राधिकारी होना चाहिए.

Tags: Maharashtra, Shivsena



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