मीठे बोल,अपनापन, स्नेह और सम्मान के साथ बेसहारा वृद्धजनों को आश्रय दे रहा स्नेह सदन

//समाचार//

मीठे बोल,अपनापन, स्नेह और सम्मान के साथ बेसहारा वृद्धजनों को आश्रय दे रहा स्नेह सदन

जिला प्रशासन द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में जीवन के अंतिम पड़ाव में वृद्धजनों को मिल रहा सम्मान और परिवार जैसी ममता

यहाँ की दीवारें केवल ईंट और सीमेंट से नहीं, बल्कि अपनापन और स्नेह की झलक हैं

कोरबा 03 सितंबर, 2025/ जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुँच कर जब शरीर ने सेवा करना छोड़ दिया हो, जब हाथ थर्रा रहे हों, कदम कमज़ोर पड़ गए हों, और आँखों से चीरता अकेलापन छलक रहा होकृऐसे समय पर यदि परिवार का छाया न मिले, तो हर सुकून खो जाता है। परिवार से निकाला जाना, घर की छत से बेघर होना, अपनों से दूर एकांत में जीना, यह सब कोई बुज़ुर्ग अपने जीवनकाल में कभी भी देखना, महसूस करना नहीं चाहता। वह सिर्फ चाहते है दो मीठे बोल, स्नेह, सम्मान, अपनत्व।
कोरबा जिले के सर्वमंगला नगर में ऐसा ही दर्द समझने वाला एक स्नेहिल घर है स्नेह सदन वृद्धाश्रम ऐसा घर, जहाँ बुजुर्गों को केवल आश्रय और सुविधाएँ ही नहीं, बल्कि दिल से दिया गया गहरा स्नेह, अपनापन, ममता और सम्मान प्राप्त होता है। यह वह स्थान है जहाँ बुजुर्गों को सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन के इस पड़ाव पर एक परिवार जैसा स्नेहिल और सम्मानपूर्ण माहौल दिया जाता है, जो उनकी ज़िंदगी को गरिमा और खुशी से भर देता है, उन सभी बुजुर्गों की जिंदगी में नई रोशनी, नई उमंग और अपनत्व का प्रतीक है जिन्हें जीवन ने कभी अकेला छोड़ दिया था।
राज्य सरकार के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन कोरबा की संवेदनशीलता से, जिला खनिज संस्थान न्यास मद से बना यह आश्रम न केवल एक आश्रय है, जहां बुजुर्गों को खुले दिल से अपनाया जाता है। अभी यहां कुल 26 बुजुर्ग निवासरत हैं 11 पुरुष और 15 महिलाएं। हर कोई अलग जीवन संघर्ष के बाद यहां आया है, लेकिन अब यहाँ सब एक-दूसरे के साथी, दोस्त और परिवार बन चुके हैं। यहाँ की व्यवस्थाएँ इतनी सम्पूर्ण हैं कि कोई भी बुजुर्ग कदम-कदम पर खुद को घर जैसा महसूस करता है खानाः पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन, जो जैसे माँ के हाथों बना हो, रहने की सुविधाः आराम दायक बेड, पूरी सफाई के साथ, ताकि हर रात चैन की नींद निकले, नियमित हाउसकीपिंग जिससे स्वच्छता हर कोने में दिखती है, वाशिंग मशीन और ड्राईक्लीन की सुविधा, प्रत्येक बेड के पास अलमारी ताकि बुजुर्गों की चीज़ें सुरक्षित रह सकें और सीसीटीवी कैमरों से सुरक्षित वातावरण।

दिनचर्या जो देती है ऊर्जा

यहाँ हर दिन बुजुर्गों के स्वास्थ्य और आनंद को ध्यान में रखकर योजनाबद्ध दिनचर्या का पालन किया जाता है। सुबह की शुरुआत योग और ध्यान से होती है जिसके बाद सभी तैयार हो कर नाश्ते के लिए हॉल में आ जाते है, टी.वी. देखना, आपसी बातचीत और मनोरंजन की गतिविधियाँ, दोपहर होते होते भोजन के बाद सभी आराम के लिए अपने अपने कक्ष में चले जाते है, शाम में खेल जैसे कुर्सी दौड़, कैरम, अंताक्षरी, शाम ढलते ही मंदिर कक्ष में भजन और सत्संग का अद्भुत वातावरण देखने को मिलता है, रात में सामूहिक भोज और फिर हल्की सैर के बाद विश्राम किया जाता है। यहां रहने वाले वृद्ध बताते हैं कि आश्रम का वातावरण इतना खुशनुमा और अपनत्व से भरा है कि उन्हें यह सोचने का भी समय नहीं मिलता कि वे अपने बच्चों और घर से दूर हैं।

वृद्धों की ज़ुबानी स्नेह सदन की कहानी

अब घर की याद नहीं आती-कमला बाई

कोरबा से जिला ब्यूरो चीफ
महेंद्र सोनवानी की खास रिपोर्ट
Ntv time छत्तीसगढ़

श्री पदुम डडसेना, जो सारंगढ़ जिले से यहाँ आए हैं वे कहते हैं जब पहली बार यहाँ आया था तो मन में डर था कि पता नहीं सब कुछ कैसा रहेगा कैसामाहौल मिलेगा, लेकिन यहाँ सभी लोग मिलनसार हैं। उम्रदराज़ साथी खेलते, गाते, बातें करते हैं। आज मुझे लगता है कि मैंने एक नया परिवार पा लिया है। इस तरह कमला बाई, जो फूलझर ग्राम पंचायत, मुंगेली की हैं, वे कहती हैं “यहाँ किसी चीज़ की कमी नहीं है। त्योहार मिलकर मनाते हैं। अभी गणेश चतुर्थी का त्यौहार है हमने मंदिर में मूर्ति स्थापित किए है शाम में सभी एक साथ बैठ गाने भजन गाते है, ढोलक बजाते है, यहां घर से ज्यादा सुविधा और आराम है और अब घर की याद भी नहीं आती क्योंकि यहाँ सब एक-दूसरे का परिवार बन चुके हैं।”
अधीक्षिका सुश्री मेघा प्रधान, जो खुद एक माँ की तरह सभी का ख्याल रखती हैं, बताती हैं कि उनका सबसे बड़ा काम यहाँ के बुजुर्गों को मानसिक रूप से मजबूत रखना है। “शारीरिक सुविधाएँ तो दी जा सकती हैं, लेकिन जो दर्द अकेलापन देता है, उसे दूर करना सबसे मुश्किल है।“ वह बताती हैं कि शुरुआत में कुछ बुजुर्ग बहुत शांत और गुमसुम रहते थे, मानो उनके भीतर का संसार पूरी तरह से टूट चुका हो। लेकिन धीरे-धीरे, यहाँ के सकारात्मक माहौल, सामूहिक गतिविधियों और आपसी बातचीत ने उनके मन के घावों पर मरहम लगाना शुरू किया। आज वही लोग सबसे ज्यादा सक्रिय और खुश नज़र आते हैं। स्नेह सदन उन सभी बुजुर्गों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जिन्हें उनके अपनों ने छोड़ दिया है। यह दिखाता है कि अकेलापन कोई नियति नहीं है। वृद्धाश्रम की सफलता केवल कोरबा जिले ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य के लिए एक उदाहरण है कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन मिलकर कैसे जीवन के अंतिम पड़ाव को भी गरिमामय एवं सम्मानपूर्वक बना रही हैं। यह आश्रम सिर्फ बुजुर्गों को रहने की जगह नहीं दे रहा, बल्कि उन्हें एक नया जीवन दे रहा है। एक ऐसा जीवन, जहाँ उन्हें फिर से हंसी, प्यार और अपनत्व मिला है। जहाँ वे अपनी पुरानी पहचान को भूलकर एक नए परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। यहाँ की कहानियाँ बताती हैं कि बुढ़ापा एक बीमारी नहीं, बल्कि जीवन का एक और खूबसूरत पड़ाव है, जिसे सम्मान, प्यार और देखभाल के साथ जिया जा सकता है। स्नेह सदन दिखाता है कि जब हम अपने बड़ों को सम्मान देते हैं, तो हम वास्तव में खुद को एक बेहतर इंसान बनाते हैं।

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