तेरहवीं के साथ भंडारे में 6 हजार लोगों का होगा भोजन, जानें इस बंदर के लिए आखिर क्यों किया जा रहा ये सब
रतलाम : आलोट तहसील में बंदर को लेकर एक गांव आतंकित है, तो दूसरा गांव एक बंदर की मौत पर गमजदा है . जी हां, माधोपुर गांव में एक बुजुर्ग बंदर की मौत होने पर पूरे गांव में गम का माहौल है. सोमवार को यहां एक बंदर की मौत के बाद पूरे विधि विधान और बैंड के साथ उसकी शव यात्रा निकाली गई और किसी संत की तरह उसे समाधि दी गई. यही नहीं अब इस गांव के लोग उस बंदर का पूरा क्रियाकर्म भी कर रहे हैं. जिसमें उसके मृत्युभोज का आयोजन गांव के लोग करने वाले हैं. जिसमें पूरे गांव को भोजन करवाया जाएगा.
रतलाम में बंदर की तेरहवीं क्यों?
दरअसल, गांव वालों का मानना है कि वह बंदर उनके परिवार का ही सदस्य था और गांव के धार्मिक आयोजन में शामिल रहता था. गांव वालों का कहना है कि जिस तरह से किसी संत महात्मा के देह त्यागने पर उनकी भव्य शोभा यात्रा निकाल कर उनकी समाधि बनाई जाती है और भंडारे का आयोजन रखा जाता है. उसी तरह इस वानर राज को भी संत महात्मा की तरह ही विदाई दी गई है और पूरे गांव में भंडारे का भी आयोजन रखा गया है.
बंदर कैसे बना गांव का सदस्य?
गांव के बनेसिंह बताते हैं, “‘ कुछ सालों पहले गांव में रामायण पाठ के आयोजन में इस बंदर ने आना शुरू किया था. जिसके बाद गांव में कोई भी धार्मिक आयोजन हो तो यह बंदर हमेशा अपनी उपस्थिति देता था. गांव के कुछ लोग तो बंदर को हनुमान जी का ही रूप मानते थे. गांव के बुजुर्ग भेरूसिंह बताते हैं कि रामायण और भागवद जी का पाठ वह इतनी गंभीरता के साथ बैठकर सुनता था जैसे की कोई मनुष्य ही हो.
गांव के धार्मिक आयोजनों का गांव के धार्मिक आयोजनों का वह हिस्सा सा बन गया था. उम्र पूरी हो जाने पर उसने देह त्याग दिया. जिसके बाद गांव के लोगों की ऐसी श्रद्धा और भावना है कि मंदिर पर प्रतिदिन रामायण पाठ और तेरहवीं में भंडारे का आयोजन किया जाए.
युवाओं से लेकर बुजुर्गों से दोस्ती
गांव के युवा विनय और संदीप ने बताया, ” बंदर से गांव में बच्चे भी नहीं डरते थे. बंदर भी बिना डरे किसी भी पास आकर बैठ जाता था. बंदर और लोगों के बीच एक अनोखा दोस्ताना बन गया था. उसकी मृत्यु से गांव के सभी लोगों को दुख हुआ. जिसके बाद पूरे सम्मान के साथ बंदर को अंतिम विदाई दी गई.”
बंदर करते हैं है मनुष्यों जैसा व्यवहार
पशु पक्षियों के व्यवहार और जूलॉजी डिपार्टमेंट की प्रोफेसर वैशाली गुप्ता ने बताया, ” बंदर, चिंपांजी और गोरिल्ला जैसे पशु मनुष्यों जैसा व्यवहार करते हैं. बंदरों से ही मनुष्य प्रजाति का विकास हुआ है. इंसानी बस्तियों के आसपास रहने वाले बंदर मानव व्यवहार ज्यादा जल्दी सीखते हैं और समझते हैं. ऐसे में वह मनुष्यों से दोस्ताना व्यवहार भी करने लगते हैं.
भंडारे में 6 हजार लोगों का भोजन
गांव के सरपंच पुरसिंह गुर्जर ने बताया, ” हमारे गांव के संत शांति पुरी जी महाराज के मार्गदर्शन में हमने दिवंगत प्राणी का विधिवत अंतिम संस्कार और उसके पश्चात भंडारे का आयोजन रखा है. वर्तमान में अखंड रामायण का पाठ चल रहा है जिसकी सम्पत्ति 10 अगस्त को होगी. उसी दिन पूरे गांव और आसपास के क्षेत्र के लोगों का भोजन प्रसादी रखी गई है. जिसमें पूरी सब्जी और चावल का पुलाव बनाया जाएगा. माधोपुर में बंदर की आत्मशांति के लिए 10 अगस्त 2025 रविवार को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा.”
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