बुजुर्गों के हक में बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: प्रताड़ित करने वाले बेटे को 4 हफ्ते में घर खाली करने का आदेश
मुंबई/पुणे:
बुढ़ापे में बच्चों की प्रताड़ना झेल रहे बुजुर्ग माता-पिता के पक्ष में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपनी ही प्रॉपर्टी में बिना किसी मानसिक तनाव के, शांति और सम्मान के साथ जीने का पूरा कानूनी अधिकार है। कोर्ट ने पुणे के एक फ्लैट से बेटे को बाहर निकालने (बेदखल करने) के जिला प्रशासन के फैसले को सही ठहराया है और बेटे को घर खाली करने के लिए 4 हफ्ते की मोहलत दी है।
अदालत ने क्या कहा?
जस्टिस अमित बोरकर की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए बेटे की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने बेदखली के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि बेटा माता-पिता के साथ उसी घर में रह रहा है, उसका प्रॉपर्टी पर कोई पक्का कानूनी अधिकार नहीं हो जाता। बच्चों का केवल वहां रहना, माता-पिता के मालिकाना हक को कम नहीं कर सकता। अगर बच्चों के बर्ताव से बुजुर्गों को मानसिक परेशानी हो रही है, तो उन्हें अपनी संपत्ति सुरक्षित रखने का पूरा हक है।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला पुणे के एक फ्लैट का है, जहां रहने वाले बुजुर्ग माता-पिता अपने बेटे के व्यवहार और रोज-रोज के झगड़ों से बेहद परेशान थे। मानसिक तनाव से तंग आकर उन्होंने ‘सीनियर सिटीजन एक्ट, 2007’ के तहत ट्रिब्यूनल में शिकायत की थी। मामले की जांच के बाद पुणे के एडिशनल कलेक्टर ने बेटे को फ्लैट खाली करने का आदेश दिया था। इसके बाद बेटे ने इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली।
4 सप्ताह में सौंपना होगा कब्जा
हाई कोर्ट ने बेटे की दलीलों को अमान्य करते हुए उसे आदेश दिया है कि वह 4 हफ्ते के भीतर पुणे वाले फ्लैट को पूरी तरह से खाली कर दे और उसका शांतिपूर्ण कब्जा अपने बुजुर्ग माता-पिता को सौंप दे। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह फैसला देश के उन तमाम बुजुर्गों को संबल देगा जो अपने ही बच्चों के कारण बुढ़ापे में मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं।
