बूढ़ी मांडू -इतिहास के पन्नों में दफन अनमोल विरासत
संरक्षण के अभाव और उपेक्षा का शिकार मांडू से पहले अस्तित्व में रहा बूढ़ी मांडू
राहुल सेन मांडव
मो
मांडू न्यूज/शताब्दियों के समृद्धि इतिहास का साक्षी बूढ़ी मांडू इतिहास के पन्नों में दफन हो गया है। संरक्षण के अभाव में ऐतिहासिक धरोहर उपेक्षित पड़ी है। यहां 250 से भी ज्यादा प्राचीन मूर्तियां, जीर्ण शीर्ण मंदिरों के अवशेष, खंडहरों, प्राचीन घाटों, टूटे शिखर, प्राचीन दीवारों के साथ आठवीं, नवी और दसवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट ,परमार और परिहार कालीन धरोहर टकटकी लगाए अपने उत्थान की राह देख रही है। धरोहरों को सहजने के सरकार के दावे कितने खोखले हैं इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब तक बुद्धि मांडू पहुंचने का मार्ग भी नहीं बन सका है।
सुनसान पहाड़ियों से घीरे इस स्थान पर इतिहास बिखरा हुआ है।13 वीं शताब्दी में प्रतिहारों के राज में मांडू से लगे सोडपुर के निकट बने जंगल में बूढ़ी मांडू में अभी भी शिवलिंग, गणेश मूर्तियां सहित कई धरोहर लावारिस अवस्था में पड़ी है यह समय रहते सुरक्षित किया जा सकता है।

यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल मांडू से नीचे खाई में स्थित है। मांडू से पहले अस्तित्व में रहने के कारण इसे बूढ़ी मांडू कहा जाता है। अब तक पहुंचाने के लिए यहां पक्के मार्ग का निर्माण नहीं किया गया है। वर्तमान स्थिति बेहद दयनीय है और विरासत धूल खा रही है। बूढ़ी मांडू का व्यापक ऐतिहासिक महत्व मिलता है। परमार काल से इसका गहरा नाता है। प्रतिहा का भी यह महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां धरोहरों में वास्तु कला के अद्भुत नमूने देखने को मिलते हैं। प्राचीन नगरी होने के कारण इसका ऐतिहासिक महत्व है। वर्तमान में कोई भी विभाग बूढ़ी मांडू के संरक्षण के लिए जवाबदार नहीं है। यहां धरोहरों के रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं है। पहुंच मार्गों पर अतिक्रमण फैला हुआ है। बूढ़ी मांडू अपनी पहचान का संकट गहराने लगा है। सरकार को इस स्थान के महत्व का समझते हुए जवाबदारी के साथ इसे सुरक्षित किया जाना चाहिए नियम अनुसार सीमा का निर्धारण कर अतिक्रमण पर कार्रवाई करना चाहिए सूचना पर लगाकर डिजिटल पहचान और समय बद्ध कार्य योजना के साथ इस प्राचीन महत्वपूर्ण स्थल का विकास होना चाहिए। इस महत्वपूर्ण स्थान का इतिहास पर्यटक और इतिहासकार में जान सके इसलिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग होना चाहिए साथ ही मांडू आने वाले पर्यटकों को बूढ़ी मांडू की पूरी जानकारी मिल सके इसे लेकर कवायद होनी चाहिए।
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विसारा आर्किटेक्ट के बेहतरीन नमूने बुद्धि मांडू के वास्तु शिल्प
बूढ़ी मांडू की वास्तुशिल्प पर काम कर रहे प्रसिद्ध आर्किटेक्ट ईशान नाथू ने बताया कि बूढ़ी मांडू का इतिहास पांचवीं, छठी शताब्दी से देखने को मिलता है पर प्रमाणित इतिहास के अनुसार यहां राष्ट्रकूट, परमार और प्रतिहार वंश का राज्य था। यहां के वास्तु शिल्प की खासियत यह है कि यह द्रविडियन यानी दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय वास्तुकला के संगम का बेहतरीन नमूना है जिसे विसारा कहा जाता है । यह शैली हिंदुस्तान और विदेशों में बहुत कम स्थान पर देखने को मिलती है नाथू के अनुसार यहां इतिहास बिखरा पड़ा हुआ है यहां धरोहरों को तत्काल सुरक्षित कर बचाने के साथ ट्रैकिंग मार्ग विकसित करने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।
खास खास
धार के किले और अन्य स्थानों पर रखी है बूढ़ी मांडू से निकली 204 प्राचीन प्रतिमाएं।
आसपास के ग्रामीणों के अनुसार बूढ़ी मांडू से प्राचीन मूर्तियां और धरोहर चोरी हो रही है जिस तरफ किसी का ध्यान नहीं है।
मध्य प्रदेश और केंद्र सरकार के विभागों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण नहीं हो पा रहा प्राचीन महत्व की धरोहर का संरक्षण।
पक्का मार्ग न होने के कारण चाह कर भी पर्यटक और इतिहास प्रेमी नहीं हो पा रहे प्राचीन धरोहर से रूबरू।