सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार बुधनी के लाड़कुई कोसमी कष्टागार क्षेत्र में की गई वन विभाग द्वारा बड़ी कार्रवाई।
पूर्व सरपंचों और उनके रसूखदार परिवारों द्वारा वन भूमि पर किया गया था अनाधिकृत कब्जा
जया यादव ने वन परिक्षेत्र अधिकारी के रूप में विधायक की फटकार के बावजूद डटकर पूरी कराई कार्रवाई।
कांग्रेस ले रही उड़ता तीर, अवैध कब्जे की अधूरी जानकारी के बावजूद राजनीति
बुधनी (सीहोर)। नितिन मालपानी
मध्य प्रदेश के सीहोर वन मंडल अंतर्गत आने वाले हाई-प्रोफाइल बुधनी विधानसभा क्षेत्र के लाड़कुई कोसमी कष्टागार के कक्ष क्रमांक 426 में वन विकास निगम और वन विभाग सामान्य के संयुक्त अमले ने एक बड़ी और ऐतिहासिक अतिक्रमण विरोधी कार्यवाही को अंजाम दिया है. वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के कड़े निर्देशों के बाद एक्टिव हुए अमले ने जंगल की बेशकीमती सरकारी जमीन पर हुए अनाधिकृत कब्जों को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है. प्रशासन की इस अचानक हुई सख्त कार्यवाही से समूचे क्षेत्र में हड़कंप मच गया है, वहीं जमीनों पर अवैध रूप से कुंडली मारकर बैठे लोगों को भी स्पष्ट और कड़ा संदेश दे दिया गया है कि वन भूमि पर किसी भी प्रकार का अनाधिकृत कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
4 जेसीबी मशीनों से 3 घंटे तक चला पीला पंजा, 30 एकड़ भूमि मुक्त
प्रशासनिक अमला पूरी तैयारी के साथ सुबह ठीक 10:00 बजे कोसमी गांव के कष्टागार क्षेत्र में दाखिल हुआ और दोपहर 1:00 बजे तक करीब तीन घंटे तक लगातार ताबड़तोड़ कार्यवाही चलती रही. इस महाभियान में 4 जेसीबी मशीनों का एक साथ इस्तेमाल किया गया, जिसने देखते ही देखते वन भूमि पर अवैध रूप से बनाए गए 6 पक्के मकानों को जमींदोज कर दिया. इसके अलावा, अवैध रूप से कब्जा की गई जमीन पर सिंचाई और पेयजल के लिए खोदे गए एक विशाल कुएं को भी भारी मात्रा में मिट्टी डालकर पूरी तरह से पूर दिया गया. इस कार्यवाही के तहत कुल मिलाकर लगभग 30 एकड़ की सरकारी वन भूमि को भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त करा लिया गया है.
आदिवासियों का शांतिपूर्ण सहयोग, आशियाने उजड़ने पर पसरा मातम
आमतौर पर लाड़कुई वन परिक्षेत्र और बुधनी विधानसभा के इस संवेदनशील इलाके में जब भी वन विभाग की टीम अतिक्रमण हटाने पहुंचती है, तो आदिवासियों द्वारा उग्र विवाद की स्थिति उत्पन्न की जाती है और कई बार वन अमले पर जानलेवा हमला या पथराव भी देखा गया है. लेकिन इस बार की कार्यवाही की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि प्रभावित लोगों ने कानून को हाथ में लेने के बजाय खुद प्रशासनिक अमले का सहयोग किया. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि अतिक्रमणकारी बिना किसी विवाद के शांतिपूर्ण ढंग से स्वयं अपना सामान मकानों से बाहर निकालते हुए नजर आए. हालांकि, अपने सपनों का महल टूटते और आशियाना उजड़ते देख पीड़ित आदिवासी परिवारों की महिलाओं और बच्चों में दुख और रोने-बिलखने का भारी माहौल व्याप्त था.
विधायक रमाकांत भार्गव ने रेंजर को फटकारा, मीडिया के कैमरे कराए बंद
जैसे ही क्षेत्रीय भाजपा विधायक रमाकांत भार्गव को सूचना मिली कि कोसमी में आदिवासियों के मकान तोड़े जा रहे हैं, वे तुरंत भारी लाव-लश्कर के साथ मौके पर पहुंच गए. विधायक ने आदिवासियों की पैरवी करते हुए वहां मौजूद वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) जया यादव को आड़े हाथों लिया और सार्वजनिक रूप से जमकर फटकार लगानी शुरू कर दी. स्थिति को बिगड़ता देख और अपनी ही सरकार के प्रशासनिक तंत्र की कार्यवाही पर गुस्सा जाहिर करते हुए विधायक महोदय ने वहां मौजूद मीडियाकर्मियों और आम जनता को सख्त हिदायत दी कि कोई भी व्यक्ति इस बहस या कार्यवाही का वीडियो न बनाए, जिसके बाद सबके कैमरे बंद करवा दिए गए.
महिला रेंजर का विधायक को दो टूक जवाब, राजनीतिक गलियारों में मची हलचल
विधायक रमाकांत भार्गव की भारी नाराजगी के बावजूद वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) जया यादव अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहीं. उन्होंने पूरे आत्मविश्वास और निडरता के साथ विधायक के सामने डटकर खड़े होकर दो टूक शब्दों में जवाब दिया कि वे अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर रही हैं, बल्कि उनके पास DM (जिला कलेक्टर) और वरिष्ठ अधिकारियों के लिखित आदेश हैं. रेंजर ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठों के निर्देशों के पालन में ही अतिक्रमणकारियों पर यह वैधानिक कार्यवाही की जा रही है और यह अभियान आगे भी इसी तरह निरंतर जारी रहेगा. एक महिला अधिकारी द्वारा सीधे विधायक के सामने ऐसा दृढ़ और बेबाक स्टैंड लेने से मौके पर विधायक जी की भारी किरकिरी हो गई और यह वाकया पूरे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया.
शाम को ‘आंसू’ लेकर पहुंचे शिवराज सिंह, अपनी ही सरकार को कोसा
कार्रवाई के बाद शाम करीब 6:30 बजे पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अचानक पीड़ित आदिवासी परिवारों के बीच पहुंचे. रोते-बिलखते आदिवासियों को गले लगाते हुए उन्होंने इसे ‘जुल्म की पराकाष्ठा’ करार दिया और अपनी ही भाजपा सरकार के प्रशासनिक अमले पर जमकर बरसे. शिवराज सिंह चौहान ने पीड़ितों को ढाढ़स बंधाते हुए घोषणा की कि हम सब चंदा इकट्ठा करके इन गरीब परिवारों के मकान फिर से बनवाएंगे. उन्होंने तत्काल मौके से ही मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल और भाजपा प्रदेश संगठन को फोन लगाकर कार्यवाही करने वाले अधिकारियों को ‘जल्लाद’ तक कह डाला और उनकी जवाबदेही तय करने को कहा. उन्होंने यह भी कहा कि वे इस पूरे मामले को लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भी विस्तार से चर्चा करेंगे.
18 साल बनाम 40 साल का कब्जा: पट्टा न मिलने पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरी हाई-प्रोफाइल नौटंकी ने कई बड़े और गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं. अतिक्रमणकारी पीड़ित परिवारों का खुद दावा है कि वे पिछले 40 सालों से इस जमीन पर काबिज हैं और पुस्तैनी रूप से खेती-किसानी कर रहे हैं. ऐसे में जनता के बीच यह बड़ा सवाल गूंज रहा है कि शिवराज सिंह चौहान खुद 18 वर्षों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की शक्तिशाली कुर्सी पर रहे, तो उनके इतने लंबे कार्यकाल में इन आदिवासियों को इस जमीन का वैध पट्टा क्यों नहीं मिल पाया? असल में, इसके पीछे गहरी वोट बैंक की राजनीति है. यह अतिक्रमण वर्ष 2018 में भी एक बार सख्ती से हटाया गया था, लेकिन अपने राजनीतिक जनाधार और वोट बैंक को बचाने के चक्कर में नेताओं ने इसे दोबारा सह दी, जिसके कारण वर्ष 2022 में यहाँ फिर से अवैध कब्जा खड़ा हो गया और कीमती सागौन के जंगलों को काटकर जमीनों को ठिकाने लगाया गया.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई कार्यवाही, धरने पर आदिवासियों को गुमराह करने का आरोप
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी कार्यवाही न तो मुख्यमंत्री मोहन यादव के निजी इशारे पर हुई है और न ही केवल स्थानीय अधिकारियों की मनमर्जी है. असल में यह पूरी बेदखली सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के अनुपालन में की जा रही है, लेकिन केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान में इतनी हिम्मत नहीं हो पाई कि वे आदिवासियों को यह कड़वा सच बता सकें. वे केवल अपनी राजनीतिक रोटी सेकने के लिए वहां पहुंचे और गरीब आदिवासियों को गुमराह करके धरने पर बैठा दिया. रात करीब 10:30 बजे तक चले इस सियासी ड्रामे के बाद शिवराज सिंह चौहान और विधायक रमाकांत भार्गव पीड़ितों को रात के अंधेरे में ठंड में छोड़कर वहां से रवाना हो गए.
कांग्रेस ने लपका ‘उड़ता तीर’, अंदरूनी गुटबाजी को लेकर घेरा
भाजपा सरकार के भीतर मचे इस घमासान और अपनों के ही आशियाने उजाड़े जाने की खबर मिलते ही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने घर बैठे-बिठाए इस उड़ते तीर को लपक लिया है. सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेताओं ने बयानों की झड़ी लगा दी है और आदिवासियों के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट की हैं. हालांकि, इन ट्वीट करने वाले कांग्रेस नेताओं को जमीनी हकीकत की पूरी जानकारी ही नहीं है. दरअसल, हटाया गया यह अतिक्रमण किसी आम गरीब का नहीं, बल्कि क्षेत्र के दो पूर्व सरपंचों के परिवारों का है, जो खुद भाजपा के कद्दावर नेता हैं और शिवराज सिंह चौहान के परम खास व बेहद करीबी माने जाते हैं. कांग्रेस अब इसे मोहन यादव बनाम शिवराज गुट की आपसी जंग बताकर सरकार को आदिवासी विरोधी साबित करने में जुटी है.
