सनातन धर्म में गणेश चतुर्थी का त्योहार बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन पर चंद्र दर्शन यानी चंद्रमा को देखना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस दिन भूलवश भी चंद्रमा को देख लेता है, तो उस पर झूठा कलंक या चोरी का झूठा आरोप लग सकता है। आइए NTV TIME की इस विशेष रिपोर्ट में जानते हैं कि आखिर इसके पीछे क्या पौराणिक कथा है और यदि भूल से चंद्र दर्शन हो जाएं तो इसके दोष से कैसे बचें।
भगवान गणेश ने क्यों दिया था चंद्रमा को श्राप?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान गणेश मूषक (चूहे) पर सवार होकर जा रहे थे। उनका भारी शरीर और लंबोदर (बड़ा पेट) देखकर चंद्र देव को हंसी आ गई। चंद्रमा को अपने रूप, रंग और सुंदरता पर बहुत घमंड था, इसलिए वे बप्पा का उपहास उड़ाने लगे। चंद्रमा के इस अहंकार और उपहास को देखकर भगवान गणेश अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि तुम्हें अपने जिस रूप पर इतना अभिमान है, वह नष्ट हो जाएगा। अब से जो भी व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर समाज में झूठा कलंक (अपयश) लगेगा।
श्राप से मुक्ति और भगवान कृष्ण की कथा
गणेश जी के श्राप देने के बाद चंद्रमा का तेज खत्म होने लगा और वे पूरी तरह से दुखी हो गए। तब सभी देवताओं की सलाह पर चंद्रमा ने भगवान गणेश की कठिन तपस्या की। चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने कहा कि मैं अपना श्राप पूरी तरह वापस तो नहीं ले सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम कर सकता हूँ। चतुर्थी का यह दिन हमेशा याद रखा जाएगा ताकि कोई अहंकार न करे।
इस कथा का सबसे बड़ा उदाहरण द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के साथ मिलता है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने भी भूलवश गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देख लिया था, जिसके कारण उन पर ‘सैमंतक मणि’ चुराने का झूठा आरोप लगा था। बाद में इस कलंक से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भी चतुर्थी का व्रत किया था।
अगर भूल से दिख जाए चांद, तो क्या करें?
मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अनजाने में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देख लेता है, तो उसे घबराने की जरूरत नहीं है। इस दोष के प्रभाव को कम करने के लिए तुरंत श्रीमद्भागवत महापुराण के 10वें स्कंध के 57वें अध्याय में वर्णित ‘सैमंतक मणि चोरी की कथा’ को सुनना या पढ़ना चाहिए। इसके अलावा नीचे दिए गए विशेष ‘कलंक मुक्ति मंत्र’ का जाप करने से भी दोष दूर हो जाता है:
“सिंहः प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥”
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NTV TIME इंदौर।
