अमेरिका में विदेशी तकनीकी पेशेवरों, विशेषकर भारतीयों को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक पारा पूरी तरह गर्म हो चुका है। अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा वर्क वीजा धारकों को ‘बंधुआ मजदूर’ (Indentured Servants) कहे जाने पर भारत सरकार ने बेहद कड़ा ऐतराज जताया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने वेंस की इस टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण, अनुचित और औपनिवेशिक मानसिकता’ से प्रेरित बताया है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल, एडोब, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी जैसी 8 दिग्गज कंपनियों के लिए ग्रीन कार्ड से जुड़ी PERM (Permanent Labor Certification) प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
वेंस के आरोप और H-1B वीजा का पूरा गणित
- विवादित टिप्पणी: जेडी वेंस ने H-1B वीजा धारकों की तुलना “फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स” यानी विदेशी बंधुआ मजदूरों से की है।
- भारतीयों की हिस्सेदारी: अमेरिका में सक्रिय कुल H-1B वीजा धारकों में अकेले 71 फीसदी हिस्सेदारी भारतीयों की है।
- वेतन में अंतर का दावा: वेंस का आरोप है कि विदेशी कर्मचारी अमेरिकी नागरिकों से 20,000 डॉलर से 48,000 डॉलर कम वेतन पर काम करते हैं।
- माइक्रोसॉफ्ट पर आरोप: वेंस के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट ने 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला और उनकी जगह 6,300 H-1B वीजा धारक रख लिए।
- प्रतिबंध का दायरा: यह रोक केवल PERM यानी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर है। इससे मौजूदा H-1B वीजा की वैधता पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा।
“माइक्रोसॉफ्ट ने किया व्यवस्था का सबसे बड़ा दुरुपयोग”: जेडी वेंस
वाशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने आईटी कंपनियों पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा किसी कंपनी ने इस वीजा व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं किया है। वेंस ने दावा किया कि बड़ी टेक कंपनियां अमेरिकी नागरिकों के रोजगार छीनकर सस्ते विदेशी श्रम को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे स्थानीय लोगों का वेतन प्रभावित हो रहा है। इसी के चलते अमेरिकी श्रम विभाग ने इन 8 प्रमुख कंपनियों के नए और लंबित PERM आवेदनों को प्रोसेस करने पर रोक लगा दी है।
माइक्रोसॉफ्ट ने किया व्यवस्था का सबसे बड़ा दुरुपयोग”: जेडी वेंस
वाशिंगटन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने आईटी कंपनियों पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा किसी कंपनी ने इस वीजा व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं किया है। वेंस ने दावा किया कि बड़ी टेक कंपनियां अमेरिकी नागरिकों के रोजगार छीनकर सस्ते विदेशी श्रम को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे स्थानीय लोगों का वेतन प्रभावित हो रहा है। इसी के चलते अमेरिकी श्रम विभाग ने इन 8 प्रमुख कंपनियों के नए और लंबित PERM आवेदनों को प्रोसेस करने पर रोक लगा दी है।
भारतीय विदेश मंत्रालय का पलटवार: “यह अपमानजनक और औपनिवेशिक मानसिकता”
अमेरिकी दावों को सिरे से खारिज करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने वाशिंगटन को कड़ा संदेश भेजा है। भारत ने साफ शब्दों में अपनी बात रखी है:
- औपनिवेशिक शब्दावली पर आपत्ति: भारत ने कहा कि ऐसे शब्दों (बंधुआ मजदूर) का इस्तेमाल करना जो औपनिवेशिक काल के दर्दनाक इतिहास की याद दिलाते हैं, बेहद आपत्तिजनक है।
- दोनों देशों का फायदा: भारतीय प्रोफेशनल्स केवल अमेरिका में नौकरी नहीं कर रहे, बल्कि वे अमेरिकी कंपनियों को अत्याधुनिक नवाचार, रिसर्च, उच्च उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दे रहे हैं।
- वेल्थ क्रिएशन: भारतीय टेक एक्सपर्ट्स अमेरिकी कंपनियों के शेयरधारकों के लिए संपत्ति का निर्माण कर रहे हैं और अमेरिकी जमीन पर नए रोजगार पैदा कर रहे हैं।
- प्रवासियों का इतिहास: भारत ने अमेरिकी प्रशासन को याद दिलाया कि स्वयं संयुक्त राज्य अमेरिका का पूरा इतिहास और विकास प्रवासियों की कड़ी मेहनत के दम पर ही खड़ा हुआ है।
टेक प्रोफेशनल्स के भविष्य पर क्या होगा असर?
विदेश मंत्रालय और एक्सपर्ट्स ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी श्रम विभाग की यह कार्रवाई PERM प्रोग्राम पर है, जो ग्रीन कार्ड (स्थाई नागरिकता) की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि जो भारतीय पेशेवर वर्तमान में H-1B वीजा पर वहां काम कर रहे हैं, उनके मौजूदा वर्क स्टेटस या वीजा की वैधता पर कोई संकट नहीं है। हालांकि, भविष्य में उनके लिए ग्रीन कार्ड हासिल करने की राह मुश्किल हो सकती है।
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम दोनों देशों के व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।
