नई दिल्ली
अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन ने वर्क वीजा नियमों को लेकर अब तक का सबसे सख्त कदम उठाया है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने एक नया नियम प्रस्तावित किया है, जिसके तहत नए H-1B वीजा के लिए कंपनियों को $1,03,265 (लगभग ₹98 लाख) की भारी-भरकम फीस देनी होगी। यह नियम इस साल (2026) के अंत तक लागू होने की संभावना है।
वर्तमान में H-1B वीजा की सामान्य फीस करीब $2,000 से $5,000 (लगभग ₹1.9 लाख से ₹4.7 लाख) के बीच होती है। फीस में इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी का सबसे बड़ा और सीधा असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों पर पड़ेगा।
नियम से जुड़े मुख्य बिंदु
- पब्लिक कमेंट के लिए जारी: इस ड्राफ्ट प्रस्ताव को 30 दिनों के ‘सार्वजनिक विचार-विमर्श’ (Public Comment Period) के लिए खुला रखा गया है।
- साल के अंत तक लागू होने के आसार: प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रशासन इसे वर्ष 2026 के अंत तक आधिकारिक रूप से लागू करने की योजना बना रहा है।
- फेडरल कोर्ट के फैसले के बाद नया रास्ता: ट्रम्प प्रशासन ने पिछले वर्ष एक कार्यकारी आदेश (Proclamation) के जरिये इसे लागू करने की कोशिश की थी, जिस पर फेडरल कोर्ट ने रोक लगा दी थी। अब सरकार इसे कानूनी रूप से स्थायी नियम (Permanent Regulation) बनाकर ला रही है।
भारतीयों पर क्या पड़ेगा असर?
अमेरिका द्वारा हर साल जारी किए जाने वाले कुल H-1B वीजा में से 70% से अधिक हिस्सा भारतीय नागरिकों को मिलता है। इस नए फैसले से कई स्तरों पर असर पड़ेगा:
- भारतीय IT कंपनियों की बढ़ेगी लागत: TCS, Infosys, Wipro जैसी दिग्गज भारतीय आईटी कंपनियों के लिए अमेरिकी क्लाइंट्स के पास भारतीय इंजीनियरों को भेजना अत्यधिक महंगा हो जाएगा। ₹98 लाख प्रति कर्मचारी फीस भरने से कंपनियों के मुनाफे (Profit Margin) पर बड़ा असर पड़ेगा।
- अमेरिका में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को झटका: अमेरिका की यूनिवर्सिटीज से डिग्री पूरी कर चुके भारतीय छात्रों के लिए वीजा स्पॉन्सरशिप पाना मुश्किल होगा। टेक कंपनियां शुरुआती स्तर के युवाओं (Freshers) पर इतनी भारी राशि खर्च करने से कतराएंगी।
- ‘ऑफशोरिंग’ का बढ़ेगा चलन: अमेरिका में ऑन-साइट तैनाती महंगी होने के कारण बहुराष्ट्रीय और भारतीय टेक कंपनियां काम को भारत स्थित केंद्रों (Offshore Centers) से ही संचालित करने पर ज्यादा ध्यान देंगी, जिससे भारत में घरेलू स्तर पर अवसर बढ़ सकते हैं।
ट्रम्प सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को स्थानीय नागरिकों को ही नौकरी देने के लिए मजबूर करना है। यदि यह नियम बिना बदलाव के लागू होता है, तो भारतीय पेशेवरों के लिए ‘अमेरिकन ड्रीम’ को पूरा करना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल और खर्चीला साबित होगा।
