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Pakistan सरहद पार गूंजा जयकारा: नवरात्रि के दूसरे दिन बलूचिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ में उमड़ा आस्था का सेलेब

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सरहद पार गूंजा जयकारा: नवरात्रि के दूसरे दिन बलूचिस्तान के हिंगलाज शक्तिपीठ में उमड़ा आस्था का सेलेब

बलूचिस्तान। आज शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन है और पूरा माहौल आदि शक्ति मां दुर्गा की भक्ति में लीन है। भारत के शक्तिपीठों में तो सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लगी हैं, लेकिन इस बीच एक बेहद खास और भावुक कर देने वाली तस्वीर सीमा पार पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत से आ रही है। यहां हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान की बीहड़ पहाड़ियों और प्राकृतिक गुफाओं के बीच स्थित महाशक्तिपीठ हिंगलाज माता के दरबार में आज नवरात्रि के दूसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी है।

आज माता के दूसरे स्वरूप ‘मां ब्रह्मचारिणी’ की पूजा के अवसर पर स्थानीय सिंधी और बलोच हिंदू समुदाय के लोग कठिन रास्तों को पार कर माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। पूरी घाटी ‘जय माता दी’ और ‘नानी मां की जय’ के नारों से गूंज उठी है।

साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल: बलोच मुस्लिम कर रहे ‘नानी के हज’ की सुरक्षा

हिंगलाज माता का यह दरबार केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय बलोच मुस्लिम समुदाय के लिए भी उतना ही पवित्र और पूजनीय है। स्थानीय मुस्लिम आबादी इस मंदिर को बेहद आदर के साथ ‘नानी का मंदिर’ या ‘नानी की दरगाह’ कहती है। इस दुर्गम और अशांत क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने और हिंदू तीर्थयात्रियों की सेवा के लिए बलोच मुस्लिम समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर प्रशासन का सहयोग कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इस पवित्र यात्रा को ‘नानी की हज’ के रूप में भी सम्मान दिया जाता है, जो सदियों से चली आ रही अंतरधार्मिक एकता और आपसी भाईचारे की एक बेमिसाल कहानी बयां करता है।

‘चंद्रकूप’ ज्वालामुखी पर नारियल अर्पण और गुफा में विशेष पूजा

नवरात्रि के दूसरे दिन की ताजा स्थिति की बात करें तो मंदिर परिसर और उसके आसपास सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम हैं। माता हिंगलाज के दर्शन की शुरुआत एक बेहद अनूठी और कठिन रस्म से होती है। श्रद्धालु सबसे पहले मंदिर के मार्ग में स्थित पवित्र मिट्टी के जीवंत ज्वालामुखी ‘चंद्रकूप’ (बाबा चंद्रगुप्त) के शिखर पर चढ़ते हैं। वहां उबलते हुए कीचड़ के क्रेटर में नारियल और गुलाब की पंखुड़ियां अर्पित कर माता के दर्शन की आत्मिक अनुमति मांगी जाती है।

इसके बाद श्रद्धालु हिंगोल नदी में पवित्र स्नान करते हैं, जिसे हिंदू मान्यताओं में गंगा स्नान के समान फलदायी माना गया है। इसके पश्चात प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थापित, बिना किसी मानव निर्मित मूर्ति के, सिंदूर से सने आदि-पिंड स्वरूप के दर्शन किए जा रहे हैं। आज सुबह से ही श्रद्धालु माता को लाल चुनरी, नारियल और सिंदूर चढ़ाकर विशेष आरती और अखंड कीर्तन कर रहे हैं।

पौराणिक इतिहास और लोककथाएं: जब शिव के तांडव से थमी थी सृष्टि

धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से हिंगलाज माता मंदिर को सनातन धर्म के 51 शक्तिपीठों में सर्वोच्च और सबसे पहला स्थान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह कर लिया था, तब क्रोधित भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में तांडव करने लगे थे। सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े किए थे। माना जाता है कि माता सती का सिर (ब्रह्मरंध्र) इसी मकरान तट की पहाड़ी पर गिरा था। क्योंकि शरीर में सिर सर्वोपरि होता है, इसलिए हिंगलाज शक्तिपीठ की महिमा को सबसे दिव्य माना गया है।

इसके अतिरिक्त, इस स्थान से जुड़ी दो बेहद महत्वपूर्ण पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं:

  • भगवान परशुराम की कथा: लोक कथाओं के अनुसार, जब भगवान परशुराम क्षत्रियों का संहार कर रहे थे, तब कुछ क्षत्रिय राजाओं ने माता हिंगलाज की शरण ली थी। माता ने परशुराम जी के क्रोध से उनकी रक्षा की और उन क्षत्रियों को अपने शस्त्र त्यागकर वेद पढ़ने और बुनकर (कपड़ा सिलने) का कार्य करने की प्रेरणा दी। यही कारण है कि आज भी भारत के कई राज्यों (जैसे गुजरात और राजस्थान) के बुनकर समाज माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं।
  • भगवान श्री राम की यात्रा: रामायण काल से जुड़ी मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण का वध करने के बाद भगवान श्री राम पर ‘ब्रह्महत्या’ का दोष लगा था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी के साथ हिंगलाज माता की अत्यंत कठिन पैदल तीर्थयात्रा की थी। यात्रा के दौरान जब पानी का संकट गहराया, तब माता सीता की प्रार्थना पर स्वयं हिंगलाज भवानी ने वहां जल की धारा प्रकट की थी।

वैश्विक पर्यटन और भारत से जुड़ाव की नई कूटनीति

वर्तमान परिदृश्य में हिंगलाज माता मंदिर का महत्व वैश्विक स्तर पर और अधिक बढ़ गया है। हाल ही में इस ऐतिहासिक परिसर को एक ग्लोबल टूरिस्ट साइट के रूप में भी विकसित करने की पहल की गई है, जिसके तहत बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के उन्नयन के लिए विशेष बजट आवंटित कर रही है।

हाल के महीनों में बलोच सामाजिक और राजनीतिक नेताओं ने भारतीय श्रद्धालुओं को पूरी सुरक्षा के वादे के साथ हिंगलाज यात्रा पर आने का खुला निमंत्रण दिया है। इस कूटनीतिक पहल के बाद भारत के धार्मिक संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि करतारपुर कॉरिडोर की तर्ज पर हिंगलाज माता यात्रा के लिए भी दोनों देशों के बीच एक आधिकारिक और सुलभ तीर्थ प्रोटोकॉल तैयार किया जाए, ताकि भारत के आम नागरिक भी सुगमता से माता के दर्शन कर सकें।

इस बीच, भारत के भीतर भी इस बार माता हिंगलाज के प्रति एक अलग ही लहर देखी जा रही है। मध्य प्रदेश के भोपाल (अवधपुरी) में इस नवरात्रि पाकिस्तान के इसी मूल हिंगलाज मंदिर और उसकी प्राकृतिक गुफा की हूबहू भव्य और अलौकिक झांकी सजाई गई है। जो श्रद्धालु चाहकर भी पाकिस्तान नहीं जा पा रहे हैं, वे भोपाल में साक्षात माता हिंगलाज के स्वरूप का दर्शन कर इस नवरात्रि अपनी आस्था को पूर्ण कर रहे हैं।

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