श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश): भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष में एक और ऐतिहासिक कामयाबी की इबारत लिख दी है। इसरो के सबसे भरोसेमंद और भारी-भरकम रॉकेट GSLV-F18 ने देश के अत्याधुनिक और अगली पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 को अंतरिक्ष की निर्धारित कक्षा (GTO) में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया है। इस मिशन की सफलता से भारत का अपना स्वदेशी ‘GPS’ यानी नाविक (NavIC) प्रणाली अब बेहद मजबूत हो जाएगी और देश की विदेशी पोजिशनिंग सिस्टम पर निर्भरता पूरी तरह खत्म होने की ओर कदम बढ़ा चुकी है।
देर रात थर्राया श्रीहरिकोटा का लॉन्च पैड
इसरो के वैज्ञानिकों ने सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC-SHAR) के दूसरे लॉन्च पैड से GSLV-F18 को लॉन्च किया। तीन चरणों वाले इस 50 मीटर ऊंचे रॉकेट ने 2,232 किलोग्राम वजनी NVS-03 सैटेलाइट को लेकर आसमान का सीना चीरते हुए उड़ान भरी। उड़ान भरने के करीब 18 मिनट और 40 सेकंड बाद, रॉकेट ने सैटेलाइट को उसकी शुरुआती भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (Geosynchronous Transfer Orbit) में सटीकता से इंजेक्ट कर दिया। इसरो ने पुष्टि की है कि सैटेलाइट के सोलर पैनल्स पूरी तरह खुल चुके हैं और वह सही तरीके से काम कर रहा है। यह इस रॉकेट श्रृंखला की 20वीं ऐतिहासिक उड़ान थी।
NVS-03 सैटेलाइट क्यों है गेम-चेंजर?
NVS-03 भारत के नेविगेशन तारामंडल की दूसरी पीढ़ी (Second-Generation) का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण उपग्रह है। इसके अंदर कई ऐसी तकनीकें जोड़ी गई हैं जो इसे दुनिया के अन्य नेविगेशन सिस्टम के बराबर ला खड़ा करती हैं:
- स्वदेशी रुबिडियम एटॉमिक क्लॉक: इस उपग्रह में भारत में ही निर्मित Rubidium Atomic Clock (परमाणु घड़ी) लगाई गई है, जो बेहद सटीक समय और लोकेशन की गणना करने में सक्षम है।
- नया L1 सिग्नल बैंड: यह सैटेलाइट पुराने बैंड्स के अलावा एक नया L1 सिग्नल भी प्रसारित करेगा। यह वही सिग्नल फ्रीक्वेंसी है जिसका इस्तेमाल आज के समय में हर आम नागरिक अपने सामान्य स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच और गाड़ियों के नेविगेशन गैजेट्स में करता है। इससे अब आम जनता के लिए सीधे नाविक (NavIC) का इस्तेमाल करना बेहद सुलभ हो जाएगा।
- 1500 किमी तक का विशाल कवरेज: यह प्रणाली न केवल पूरे भारतीय मुख्य भूभाग को कवर करेगी, बल्कि देश की सीमाओं से बाहर 1,500 किलोमीटर के दायरे तक सटीक ट्रैकिंग और टाइमिंग सेवाएं प्रदान करेगी।
रणनीतिक रूप से क्यों जरूरी है स्वदेशी ‘GPS’?
वर्तमान में भारत में नागरिक और वाणिज्यिक कार्यों के लिए अमेरिकी जीपीएस (GPS) प्रणाली का सबसे ज्यादा उपयोग होता है। सामरिक और सैन्य सुरक्षा के लिहाज से किसी अन्य देश के सिस्टम पर निर्भर रहना देश की संप्रभुता के लिए सही नहीं माना जाता (जैसा कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान हुआ था जब भारत को जीपीएस डेटा देने से मना कर दिया गया था)।
NVS-03 की सफल लॉन्चिंग के बाद अब नाविक (NavIC) समूह में आवश्यक उपग्रहों की संख्या पूरी हो रही है, जिससे भारत स्वतंत्र रूप से अपनी स्टैंडअलोन पोजिशनिंग सेवाएं संचालित कर सकेगा। यह नागरिक उड्डयन, समुद्री सुरक्षा, रेलवे ट्रैकिंग, आपदा प्रबंधन और हमारी सेनाओं के ऑपरेशंस को पूरी तरह ‘आत्मनिर्भर’ बना देगा।
पिछली नाकामी को धोकर ‘स्मार्ट बॉय’ बना GSLV
इसरो के लिए यह मिशन एक बड़ी परीक्षा भी था। जनवरी 2025 में हुआ NVS-02 मिशन तकनीकी खराबी (पायरो वाल्व सिग्नल फेल होना) के कारण अपने अंतिम लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया था। इस बार इसरो के वैज्ञानिकों ने उन सभी कमियों को दुरुस्त किया और बिल्कुल नई सुधारात्मक रणनीति (Open Pyro Valves) के साथ उड़ान भरी, जो शत-प्रतिशत सफल रही। कभी अपनी शुरुआती विफलताओं के कारण अंतरिक्ष की दुनिया में ‘नॉटी बॉय’ कहा जाने वाला GSLV रॉकेट आज अपनी इस 20वीं उड़ान के साथ पूरी तरह ‘स्मार्ट बॉय’ साबित हो चुका है। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की इस ऐतिहासिक छलांग पर देशभर से इसरो की वैज्ञानिक टीम को बधाइयां मिल रही हैं।
