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CRIMEX:10 मर्डर, नायलॉन की रस्सी और 4 शातिर दिमाग छात्र…जोशी-अभ्यंकर सीरियल मर्डर्स भारत के आपराधिक इतिहास का वो सबसे खौफनाक पन्ना

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पुणे। साल 1976 और 1977 के बीच सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले शांत और सुरक्षित पुणे शहर में एक ऐसा खौफ छा गया था कि शाम ढलते ही लोग अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियां पत्थरों से चुनवा दिया करते थे। शहर के रईस परिवारों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा था। जब पुलिस ने इस गुत्थी को सुलझाया, तो सामने आया सच किसी भी आम इंसान की सोच से परे था। इस खौफनाक सिलसिले के पीछे कोई पेशेवर या पुराना अपराधी नहीं था, बल्कि शहर के एक नामी कॉलेज के चार होनहार और पढ़े-लिखे छात्र थे।

आइए पलटते हैं महाराष्ट्र पुलिस की डायरी का वो असली पन्ना, जिसे “जोशी-अभ्यंकर सीरियल मर्डर्स” के नाम से जाना जाता है।

1. अभिनव कला महाविद्यालय के वो 4 कातिल चेहरे

इस खौफनाक साजिश की शुरुआत पुणे के प्रसिद्ध ‘अभिनव कला महाविद्यालय’ (Abhinav Kala Mahavidyalaya) के कमर्शियल आर्ट्स के चार छात्रों से हुई थी। इनके नाम थे— राजेंद्र जक्कल, दिलीप सुतार, शांताराम कानिटकर और मुनव्वर शाह

ये चारों युवा कोई गरीब या अनपढ़ नहीं थे, बल्कि अच्छे मध्यमवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते थे। लेकिन इनके सिर पर बहुत कम समय में बिना मेहनत के अमीर बनने, खुद की कमर्शियल गाड़ियां खरीदने और एक इंटरनेशनल स्मगलिंग गैंग बनाने का पागलपन सवार था। पैसों की इसी अंधी हवस ने इन्हें हैवान बना दिया। इन्होंने अपनी कला की सूझबूझ का इस्तेमाल स्केच बनाने में नहीं, बल्कि कत्ल के खौफनाक मंसूबे तैयार करने में किया।

2. पहली सनसनी: दोस्त का ही मर्डर और वो नायलॉन की रस्सी

इनका पहला शिकार कोई अनजान बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि इनका ही एक कॉलेज सहपाठी (Classmate) प्रकाश हेगड़े था। प्रकाश के पिता पुणे में एक नामी रेस्तरां चलाते थे। 16 जनवरी 1976 को इन चारों ने मिलकर प्रकाश का उसकी पिता की दुकान के पास से ही अपहरण कर लिया। उनका मकसद बहुत साफ था—वे प्रकाश के पिता से 25,000 रुपये की भारी फिरौती वसूलना चाहते थे।

लेकिन फिरौती की रकम मांगने या पुलिस तक बात पहुँचने से पहले ही इन चारों के भीतर एक डर बैठ गया कि प्रकाश उनका चेहरा पहचानता है और वो पकड़ा जाएगा। पकड़े जाने के खौफ में इन्होंने प्रकाश की नायलॉन की रस्सी से गला घोंटकर बेरहमी से हत्या कर दी। लाश को ठिकाने लगाने के लिए इन्होंने एक लोहे के बड़े ड्रम में उसकी बॉडी डाली, उसमें भारी पत्थर भरे और उसे पुणे के पास स्थित पेशवे पार्क की झील में डुबो दिया। इसके बाद भी इन्होंने उसके पिता को फिरौती के पत्र भेजना जारी रखा, मानो प्रकाश अभी भी जिंदा हो।

3. अभ्यंकर कॉटेज का वो सामूहिक हत्याकांड (The Cruelest Night)

पहला कत्ल करने के बाद इन लड़कों के मन से पुलिस और कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका था। कत्ल का स्वाद इनके मुंह लग चुका था। 31 अक्टूबर 1976 की खौफनाक रात, इन्होंने पुणे के सबसे पॉश इलाके भांडारकर रोड पर स्थित मशहूर संस्कृत विद्वान काशिनाथ शास्त्री अभ्यंकर के आलीशान बंगले को अपना अगला निशाना बनाया।

इनका मकसद सिर्फ डकैती करना था, लेकिन जब घर के बुजुर्गों और बच्चों ने हिम्मत दिखाते हुए इनका विरोध किया, तो इन चारों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। इन्होंने एक-एक करके परिवार के 5 मासूम लोगों की नायलॉन की रस्सी से गला घोंटकर हत्या कर दी:

  • 88 वर्षीय असहाय बुजुर्ग काशिनाथ शास्त्री अभ्यंकर
  • उनकी 76 वर्षीय बुजुर्ग पत्नी इंदिराबाई
  • उनकी 26 वर्षीय नातिन जयवंती
  • उनका युवा पोता आनंद (उम्र 20 वर्ष)
  • और घर की बूढ़ी वफादार नौकरानी सखूबाई

4. तफ़्तीश और वो एक गवाह जिसने खेल खत्म कर दिया

लगातार हो रहे मर्डर्स से पुणे पुलिस के ऊपर जनता और सरकार का भारी दबाव था। पुलिस ने शहर के हर नामी और शातिर हिस्ट्रीशीटर को उठा लिया, लेकिन कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग रहा था। इसी बीच, इन चारों के हौसले इतने बुलंद हो चुके थे कि इन्होंने जनवरी 1977 में एक और रईस परिवार (जोशी परिवार) के 3 लोगों की ठीक इसी पैटर्न पर हत्या कर दी। अब तक पुणे में इनके हाथों मरने वालों का कुल आंकड़ा 10 तक पहुँच चुका था।

कातिल आखिर कैसे शिकंजे में आए?
इन चारों की गिरफ्तारी किसी फोरेंसिक सबूत या पुलिस की मुखबिरी से नहीं, बल्कि इनके ही एक करीबी दोस्त सुहास चांडक की गवाही से हुई। मुख्य आरोपी राजेंद्र जक्कल ने एक रात शराब के नशे में चूर होकर सुहास के सामने अपनी इन सभी खौफनाक वारदातों के बारे में शेखी बघारना शुरू कर दिया। सुहास यह सुनकर अंदर से बुरी तरह कांप गया। उसे समझ आ गया कि अगर उसने पुलिस को नहीं बताया, तो अगला शिकार वो खुद भी हो सकता है।

सुहास ने अपनी जान जोखिम में डालकर तुरंत पुणे पुलिस के आला अधिकारियों से सीक्रेट मीटिंग की। पुलिस ने तुरंत जाल बिछाया और 1977 की शुरुआत में चारों आरोपियों को अलग-अलग ठिकानों से धर दबोचा। जब इनके कमरों की तलाशी ली गई, तो मारे गए लोगों के पुश्तैनी गहने, पीड़ितों की घड़ियाँ और वो खौफनाक नायलॉन की रस्सियां बरामद हुईं, जिनका इस्तेमाल इन्होंने कत्ल के लिए किया था।

हत्याकांड के पीछे की असली वजह (The Real Motive)

इन चारों कॉलेज छात्रों के भीतर अपराध की कोई पुरानी बैकग्राउंड नहीं थी। पुलिस पूछताछ और अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इस खौफनाक सिलसिले के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें थीं:

  • लग्जरी लाइफ और गाड़ियों का पागलपन: राजेंद्र जक्कल और मुनव्वर शाह को महंगी गाड़ियां खरीदने, पुणे की सड़कों पर रईसों की तरह घूमने और एक आलीशान रेस्टोरेंट खोलने का जुनून सवार था। वे कमर्शियल आर्ट्स के छात्र थे और उन्हें लगता था कि नौकरी करके वे कभी इतने पैसे नहीं कमा पाएंगे।
  • खुद का ओवरसीज स्मगलिंग गैंग बनाना: इन चारों ने हॉलीवुड और बॉलीवुड की फिल्में देखकर यह प्लान बनाया था कि वे पुणे के अमीर घरों में डकैती डालकर करोड़ों रुपये इकट्ठा करेंगे। इस पैसे से वे एक इंटरनेशनल स्मगलिंग नेटवर्क तैयार करना चाहते थे जो बम्बई (मुंबई) से विदेशों में सामान की तस्करी करे।
  • पकड़े जाने का खौफ (Eliminating the Witnesses): इनका इरादा शुरू में सिर्फ लूटपाट करने का था। लेकिन इनका पहला शिकार (प्रकाश हेगड़े) इनका दोस्त था जो इन्हें पहचानता था। जब उन्होंने उसे मार दिया, तो उनका डर हमेशा के लिए खत्म हो गया। इसके बाद, अभ्यंकर और जोशी परिवार के मामलों में भी जब-जब किसी ने शोर मचाया या उनका चेहरा देख लिया, तो उन्होंने सबूत मिटाने के लिए घर के हर एक सदस्य (चाहे वो बूढ़े हों या बच्चे) को नायलॉन की रस्सी से मार डाला ताकि पुलिस तक कोई गवाह न पहुँच सके।

इतिहास का ऐतिहासिक कोर्ट रूम फैसला

यह केस भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में सबसे वीभत्स और ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ (Rarest of Rare) श्रेणी में माना गया। कोर्ट में चारों के खिलाफ सुहास चांडक की गवाही और बरामद किए गए आभूषणों के रूप में अचूक सबूत पेश किए गए। बचाव पक्ष के वकीलों ने इन्हें युवा और छात्र होने की दलील देकर बचाने की कोशिश की, लेकिन अदालत ने इन चारों कॉलेज छात्रों को 10 मासूम लोगों की बेरहमी से की गई हत्या का मुख्य दोषी पाया।

कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद, तारीख 27 नवंबर 1983 को पुणे की ऐतिहासिक यरवदा सेंट्रल जेल (Yerwada Jail) में चारों आरोपियों—राजेंद्र जक्कल, दिलीप सुतार, शांताराम कानिटकर और मुनव्वर शाह को एक साथ सुबह-सुबह फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। यह भारतीय क्राइम इतिहास का वो सबक था जिसने साबित किया कि जुर्म का रास्ता चाहे कितना भी चमकीला दिखे, उसका अंत सिर्फ और सिर्फ बर्बादी पर ही होता है।


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