गुम होता बचपन: डिजिटल दुनिया के शोर में खो गया हमारा पारंपरिक ‘गिल्ली-डंडा’
विशेष रिपोर्ट
इंदौर: स्मार्टफोन की चमचमाती स्क्रीन, ऑनलाइन वीडियो गेम्स की वर्चुअल दुनिया और सोशल मीडिया के अंतहीन स्क्रॉलिंग के बीच भारत का एक समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास दम तोड़ रहा है। कभी देश के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों की तंग गलियों और बड़े मैदानों की रौनक रहने वाला पारंपरिक खेल ‘गिल्ली-डंडा’ अब पूरी तरह गायब होने की कगार पर पहुंच गया है। दोपहर की कड़क धूप या शाम ढलने के वक्त मैदानों से आने वाली बच्चों की किलकारियां और गिल्ली पर डंडे की चोट से निकलने वाली ‘टक्क’ की वह जानी-पहचानी आवाज अब पूरी तरह खामोश हो चुकी है।
महंगे गैजेट्स ने छीनी मैदानों की रौनक
एक दौर था जब गिल्ली-डंडा खेलने के लिए किसी महंगे सामान या विशेष गियर की जरूरत नहीं होती थी। पेड़ की सूखी टहनी से तराशा गया एक डेढ़ फीट का डंडा और दोनों तरफ से नुकीली छोटी गिल्ली ही बच्चों की सबसे बड़ी दौलत हुआ करती थी। खेल के दौरान ‘टॉस’ जीतने की खुशी, गिल्ली को हवा में उछालकर दूर फेंकने का रोमांच और फील्डिंग करने वाली टीम द्वारा कैच पकड़ने की जद्दोजहद बच्चों को घंटों बांधे रखती थी। आज स्थिति यह है कि खेल के मैदान खाली पड़े हैं और बच्चे बंद कमरों में पबजी, फ्री फायर या प्लेस्टेशन जैसे वीडियो गेम्स में अपनी उंगलियां घिस रहे हैं।
शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर
बाल रोग विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, गिल्ली-डंडा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि यह बच्चों के समग्र विकास का एक बेहतरीन जरिया था।
- एकाग्रता और सटीक निशाना: हवा में उड़ती गिल्ली पर नजर टिकाना और डंडे से सही समय पर सटीक वार करना बच्चों की एकाग्रता (फोकस) और ‘हैंड-आई कोऑर्डिनेशन’ को मजबूत करता था।
- शारीरिक फिटनेस: गिल्ली को पकड़ने के लिए मैदान में तेजी से दौड़ना और डंडे से शॉट मारना एक बेहतरीन शारीरिक कसरत थी। आज खेल के अभाव में बच्चों में मोटापा और आंखों की कमजोरी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
- सामाजिक जुड़ाव और टीम भावना: इस खेल के जरिए बच्चे आपस में तालमेल बिठाना, हार-जीत को स्वीकार करना और संकट के समय टीम का साथ देना सीखते थे। डिजिटल दुनिया ने बच्चों को आभासी तौर पर तो जोड़ दिया है, लेकिन वे असल जिंदगी में अकेलेपन और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो रहे हैं।
बुजुर्गों की चिंता: ‘किताबों और वीडियो में सिमट जाएगी संस्कृति’
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि हमारी परंपराएं और देसी खेल हमारी पहचान का हिस्सा हैं। गिल्ली-डंडा, कंचे, खो-खो और कबड्डी जैसे खेल बच्चों को मिट्टी से जोड़कर रखते थे। यदि यही रफ्तार रही, तो आने वाली पीढ़ी को यह भी नहीं पता होगा कि गिल्ली-डंडा जैसी कोई चीज हुआ करती थी। वे इसे केवल यूट्यूब वीडियो या इतिहास की किताबों में एक अध्याय के रूप में ही देख पाएंगे।
संरक्षण की है सख्त जरूरत
जानकारों का मानना है कि इस अनमोल विरासत को बचाने के लिए अब केवल चिंता जताना काफी नहीं है। स्कूलों में खेल के पीरियड के दौरान इन पारंपरिक खेलों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर ‘गिल्ली-डंडा’ प्रतियोगिताओं का आयोजन कर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित करना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि हमारे बचपन की यह अनमोल विरासत पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दफन न हो जाए।
