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MP Drug Trafficking:एमपी में पकड़े गए विदेशी नशा तस्कर, पूछताछ में हुआ पासपोर्ट जलाने का चौंकाने वाला खुलासा

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अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट का ‘सेफ हेवन’ बनता मध्य प्रदेश; महीनेभर में 6 से ज्यादा विदेशी तस्कर गिरफ्तार, एजेंसियों की उड़ी नींद

विशेष रिपोर्ट (इंदौर/भोपाल):
शांति का टापू कहा जाने वाला मध्य प्रदेश अब अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट के नक्शे पर एक बड़े कॉरिडोर और ‘सेफ हेवन’ के रूप में उभर रहा है। पिछले चार हफ्तों के भीतर डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) और केंद्रीय नार्कोटिक्स एजेंसियों द्वारा की गई ताबड़तोड़ कार्रवाइयों ने इस कड़वे सच पर मुहर लगा दी है। राज्य के मालवा-निमाड़ और भोपाल बेल्ट से एक महीने के भीतर 6 से ज्यादा विदेशी ड्रग तस्करों की गिरफ्तारी ने खुफिया एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं।

यह महज चंद तस्करों की गिरफ्तारी का मामला नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश के भीतर चल रहे एक गहरी जड़ें जमा चुके वैश्विक नेटवर्क की बानगी है।

इंदौर-भोपाल-रतलाम कॉरिडोर: सिंडिकेट की नई लाइफलाइन

एजेंसियों की खुफिया पड़ताल में जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई है, वह है इंदौर-भोपाल-रतलाम रूट का इस्तेमाल। अब तक नशा माफिया मुंबई, दिल्ली या गोवा जैसे महानगरों को अपना मुख्य ठिकाना बनाते थे। लेकिन, इन महानगरों में बढ़ती कड़ाई के बाद तस्करों ने मध्य प्रदेश के शांत और कम रडार पर रहने वाले ग्रामीण और बाहरी इलाकों को चुना है।

पकड़े गए मामलों के विश्लेषण से साफ है कि तस्करों ने मालवा और राजधानी के आस-पास के कस्बों में किराए के मकान या बंद पड़ी फैक्ट्रियों को अपना ‘सीक्रेट लैब’ बनाया। यहाँ मेथाएमफेटामाइन (Methamphetamine) और एमफेटामाइन जैसी अत्यधिक महंगी सिंथेटिक ड्रग्स को प्रोसेस और तैयार किया जा रहा था।

‘नो डॉक्यूमेंट, नो डिपोर्टेशन’: तस्करों का शातिर पैंतरा

जांच से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पकड़े गए विदेशी नागरिकों (जिनमें अधिकांश नाइजीरिया और युगांडा के हैं) ने पूछताछ में बेहद शातिर ‘मोडस ऑपेरंडी’ (काम करने का तरीका) का खुलासा किया है। गिरफ्तार होते ही इन तस्करों का पहला बयान होता है—“हमने अपने पासपोर्ट और वीजा जला दिए हैं।”

एक पत्रकार के नजरिए से समझें तो यह कोई हताशा में उठाया गया कदम नहीं, बल्कि कानूनी शिकंजे से बचने की एक सोची-समझी क्रिमिनल स्ट्रेटेजी है:

  • असली पहचान छिपाना: बिना पासपोर्ट के यह साबित करना मुश्किल होता है कि अपराधी किस देश का मूल नागरिक है।
  • इंट्री रूट को ब्लॉक करना: एजेंसियां आसानी से यह ट्रैक नहीं कर पातीं कि इन्होंने भारत की सीमा में किस रास्ते से (वैध या अवैध) प्रवेश किया।
  • डिपोर्टेशन में कानूनी अड़चन: सजा पूरी होने के बाद भी, बिना ट्रैवल डॉक्यूमेंट्स के संबंधित देश इन्हें वापस लेने से इनकार कर देता है, जिससे ये लंबे समय तक भारत की जेलों या डिटेंशन सेंटर्स में बने रहते हैं।

दिल्ली-बेंगलुरु से जुड़े हैं तार: ‘ऑपरेशन क्रिस्टल डैगर’ की कामयाबी

DRI द्वारा हाल ही में चलाए गए ‘ऑपरेशन क्रिस्टल डैगर’ ने इस बात की पुष्टि की है कि मध्य प्रदेश में तैयार होने वाला यह नशा केवल स्थानीय स्तर पर नहीं खप रहा था। यहाँ से तैयार सिंथेटिक ड्रग्स के कंसाइनमेंट को दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों के पब-क्लब कल्चर में सप्लाई किया जा रहा था। इस ऑपरेशन के तहत जब्त की गई ड्रग्स की अंतरराष्ट्रीय कीमत करीब 7 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है।

आगे की चुनौती: फॉरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेज की तलाश

मध्य प्रदेश पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां अब इस सिंडिकेट के ‘फॉरवर्ड लिंकेज’ (कहाँ माल जाना था) और ‘बैकवर्ड लिंकेज’ (कच्चा माल कहाँ से आया) को खंगाल रही हैं। कड़ियों को जोड़ने पर अंदेशा जताया जा रहा है कि इस रैकेट के असली आका भारत से बाहर बैठकर डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी के जरिए इन विदेशी प्यादों को ऑपरेट कर रहे हैं।

यह साफ है कि यदि समय रहते मध्य प्रदेश के इन शांत इलाकों में चल रही सीक्रेट फैक्ट्रियों और विदेशी नागरिकों के अवैध रूप से ठहरने की कड़ाई से मॉनिटरिंग नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में यह राज्य सिंथेटिक ड्रग्स मैन्युफैक्चरिंग का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।


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