Home मध्य प्रदेश अमित शाह की बैठक के बाद एमपी में एक्शन; दुष्कर्म और पॉक्सो...

अमित शाह की बैठक के बाद एमपी में एक्शन; दुष्कर्म और पॉक्सो के 10,628 मामलों को निपटाने के लिए अदालतों को मिला हर महीने 14 केस का टारगेट

0

भोपाल, 6 सितंबर 2026
मध्य प्रदेश में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले जघन्य यौन अपराधों में त्वरित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए शासन ने प्रशासनिक शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई मध्य क्षेत्रीय परिषद की उच्च स्तरीय बैठक के बाद निकले सख्त निर्देशों के आलोक में, सूबे के अभियोजन विभाग ने सभी फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (FTSCs) के लिए नया और कड़ा परफॉर्मेंस टारगेट तय कर दिया है। अब प्रत्येक विशेष अदालत को प्रतिमाह औसतन 14 मुकदमों की सुनवाई पूरी कर उनका अंतिम फैसला सुनाना होगा।

अमित शाह की बैठक से मिली कार्रवाई को गति

बैठक के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने राज्यों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा तथा लंबित न्यायिक प्रक्रियाओं की बारीकी से समीक्षा की थी। केंद्र सरकार के इसी कड़े रुख को देखते हुए मध्य प्रदेश लोक अभियोजन संचालनालय ने तुरंत अपनी कार्ययोजना बदली है और मैदानी स्तर पर लंबित मुकदमों के जल्द से जल्द निस्तारण के लिए विशेष अभियान शुरू कर दिया है।

9 हजार से अधिक मुकदमों में तय समय सीमा पार

ताजा न्यायिक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में इस समय पॉक्सो (POCSO) और दुष्कर्म से जुड़े कुल 10,628 मामले लंबित हैं। गंभीर बात यह है कि देश के कानूनी प्रावधानों के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल होने के बाद दो महीने के भीतर फैसला आ जाना चाहिए, लेकिन मध्य प्रदेश में 9,278 मामले ऐसे हैं जो इस निर्धारित समय सीमा को बहुत पहले पार कर चुके हैं।

लंबित मुकदमों का समयवार आधिकारिक वर्गीकरण इस प्रकार है:

  • ताजा लंबित मामले (2 महीने से कम): 1,350 केस
  • एक साल पुराने मामले (2 से 12 महीने): 4,026 केस
  • दीर्घकालिक पेंडेंसी (1 से 5 साल): 4,936 केस
  • अति-लंबित मामले (5 साल से अधिक पुराने): 316 केस

न्याय की मौजूदा रफ्तार पर उठे सवाल

फास्ट ट्रैक अदालतों के राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक, हर एक अदालत को सालाना 165 मुकदमों का निपटारा करना जरूरी है, जो कि 13.75 केस प्रति माह बैठता है। इसके उलट, राज्य में पिछले वर्ष की समीक्षा में यह पाया गया कि अदालतों की वास्तविक कार्यक्षमता महज 6.11 मामले प्रति कोर्ट ही चल रही थी। लक्ष्य और जमीनी हकीकत के इसी 50% से अधिक के बड़े अंतर को पाटने के लिए प्रशासन ने अब यह कड़ाई बरती है।

डीएनए जांच की देरी और दोषसिद्धि दर की चुनौतियाँ

मध्य प्रदेश में इस श्रेणी के अपराधों में दोषसिद्धि दर (कन्विक्शन रेट) 23.32 प्रतिशत दर्ज की गई है। हालांकि यह राष्ट्रीय औसत से थोड़ा बेहतर है, लेकिन अभियोजन अधिकारियों का मानना है कि यदि फॉरेंसिक लैब्स से डीएनए (DNA) जांच की रिपोर्ट समय पर कोर्ट को सौंप दी जाए, तो अपराधियों को कठोर सजा दिलाने का यह प्रतिशत काफी बढ़ सकता है।

ढिलाई बरतने वाले अफसरों पर गिरेगी गाज

लोक अभियोजन संचालनालय ने सभी जिला स्तरीय अभियोजन प्रमुखों को पत्र जारी कर अदालतों की दैनिक प्रोग्रेस रिपोर्ट मांगी है। नई नीति के तहत:

  1. 5 साल से पुराने मामलों की समीक्षा: जिन मुकदमों में सालों से फैसला अटका हुआ है, उनके कारणों की सूक्ष्म समीक्षा की जाएगी।
  2. डीएनए देरी पर एक्शन: मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट समय पर जमा न करने वाले जांच अधिकारियों की सूची बनेगी।
  3. जवाबदेही तय: किसी भी स्तर पर पाई जाने वाली प्रशासनिक ढिलाई को सेवा नियमावली के तहत गंभीर लापरवाही मानकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

इस कड़े कदम का मुख्य उद्देश्य कानूनी व्यवस्था की लचर गति को सुधारना और न्याय के इंतजार में बैठी पीड़िताओं को अविलंब इंसाफ प्रदान करना है।


NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version