यूएन (UN) की चेतावनी: ग्लोबल वॉर्मिंग से समुद्र का बढ़ता जलस्तर बना टाइम बम, डूब सकते हैं देश के दो सबसे बड़े महानगर।
नई दिल्ली/न्यूयॉर्क (1 सितंबर 2026): पर्यावरण में हो रहे बदलाव और लगातार बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भारत के दो सबसे बड़े महानगरों पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई और बेहद डरावनी रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर भारत के मुंबई और कोलकाता को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के बीच हड़कंप मच गया है।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा जारी इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, समुद्र अब इंसानों के और नजदीक आ रहा है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भारत के इन दोनों तटीय शहरों में रहने वाले लाखों लोग हमेशा के लिए बेघर हो जाएंगे और उनके आशियाने पानी में समा जाएंगे।
UN Report on Sea Level Rise: क्या है संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में?
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में साफ तौर पर चेतावनी दी गई है कि दक्षिण एशिया में जलस्तर बढ़ने का सबसे घातक असर भारत और बांग्लादेश पर पड़ेगा।
- 1.4 करोड़ लोगों पर सीधा खतरा: भारत के कोलकाता और मुंबई के साथ-साथ बांग्लादेश का ढाका शहर इस संकट के केंद्र में हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के विस्थापन का तत्काल खतरा पैदा हो गया है [आज तक].
- समुद्र का पानी बढ़ने की रफ़्तार हुई दोगुनी: पिछले कुछ वर्षों में समुद्र के जलस्तर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के ग्लेशियर पिघलने के कारण अब समुद्र का पानी औसतन 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से ऊपर उठ रहा है.
- डूम्सडे ग्लेशियर: रिपोर्ट में अंटार्कटिका के ‘थवाइट्स ग्लेशियर’ को लेकर सबसे बड़ी चिंता जताई गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह ग्लेशियर पूरी तरह पिघल गया, तो वैश्विक समुद्र का स्तर अचानक आधा मीटर से अधिक बढ़ जाएगा.
मुंबई और कोलकाता ही क्यों हैं सबसे ज्यादा खतरे में?
सर्च और रिसर्च डेटा के अनुसार, मुंबई और कोलकाता की भौगोलिक स्थिति उन्हें इस आपदा के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील बनाती है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
- निचले डेल्टा क्षेत्र
कोलकाता हुगली नदी के मुहाने और निचले गंगा डेल्टा पर बसा है, जबकि मुंबई सात द्वीपों को जोड़कर बनाया गया एक तटीय शहर है। समुद्र के स्तर में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी इन शहरों के निचले इलाकों को हमेशा के लिए पानी में डुबो सकती है। - जमीन का धंसना
ग्लोबल वॉर्मिंग के साथ-साथ एक और छिपी हुई समस्या है—’लैंड सब्सिडेंस’। कंक्रीट के भारी निर्माण और ग्राउंड वाटर के अत्यधिक दोहन के कारण मुंबई और कोलकाता की जमीन धीरे-धीरे नीचे धंस रही है । ऐसे में ऊपर आता समंदर और नीचे धंसती जमीन इन शहरों के लिए ‘टाइम बम’ की तरह काम कर रहे हैं।
सिर्फ घर नहीं, पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर हो जाएगा तबाह
UN ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि समंदर नजदीक आने का मतलब सिर्फ बस्तियों का डूबना नहीं है। इससे इन महानगरों का पूरा लाइफ-सपोर्ट सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा:
- पीने के पानी का संकट: समुद्र का खारा पानी शहरों के भूमिगत जल स्रोतों में मिल जाएगा, जिससे पीने के पानी की भारी किल्लत हो जाएगी [टाइम्स ऑफ इंडिया]।
- इकोनॉमिक लॉस: मुंबई भारत की वित्तीय राजधानी है। यहाँ के रेलवे नेटवर्क, बिजली ग्रिड, और कमर्शियल बिल्डिंग्स के डूबने से देश को अरबों डॉलर का नुकसान होगा [इकोनॉमिक टाइम्स]।
- स्वास्थ्य पर असर: बार-बार आने वाली बाढ़ और खारे पानी के जमाव से तटीय इलाकों में जलजनित बीमारियों का प्रकोप बढ़ेगा, जिससे स्वास्थ्य ढांचा चरमरा जाएगा।
क्या है इस महासंकट से बचने का उपाय?
संयुक्त राष्ट्र ने भारत सहित दुनिया भर की सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा है कि इस संकट को ‘भविष्य की समस्या’ मानकर टाला नहीं जा सकता। इससे निपटने के लिए तत्काल निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
- तटीय सुरक्षा दीवारें: मुंबई और कोलकाता के चारों ओर मजबूत और आधुनिक कोस्ट-प्रोटेक्शन वॉल का निर्माण करना होगा।
- बेहतर ड्रेनेज सिस्टम: मानसून और हाई-टाइड के पानी को तेजी से बाहर निकालने के लिए ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना होगा।
- क्लाइमेट बजट: तटीय शहरों को क्लाइमेट रेजिलिएंट (जलवायु अनुकूल) बनाने के लिए भारी बजटीय आवंटन और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देना अनिवार्य है।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। यदि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले कुछ दशकों में मुंबई और कोलकाता का नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।
