नई दिल्ली: आधुनिक भारतीय राजनीति के इतिहास में 17 सितंबर का दिन एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाता है, और वह हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। जीवन के 76वें वर्ष में प्रवेश कर रहे नरेंद्र मोदी के लिए यह अवसर महज एक जन्मदिन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक इतिहास का एक ऐसा अनूठा मील का पत्थर है जिसे ‘सिल्वर जुबली इनिंग्स’ कहा जा सकता है। अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता के शीर्ष पर कदम रखने वाले मोदी आज 25 वर्षों से लगातार बिना थमे, बिना झुके सरकार के मुखिया के रूप में देश का नेतृत्व कर रहे हैं।
वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय की केतली उठाने वाले एक साधारण बालक से लेकर स्वतंत्र भारत के दूसरे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बनने का उनका यह सफर किसी राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं है।
संगठन के ‘क्राइसिस मैनेजर’: आपातकाल की भूमिगत रातों से सत्ता के केंद्र तक
नरेंद्र मोदी का सियासी सफर सीधे मखमली कुर्सियों से शुरू नहीं हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक अनुशासित प्रचारक के रूप में उन्होंने दशकों तक केवल दरी बिछाने और संगठन को सींचने का काम किया। 1975 में जब देश में आपातकाल (Emergency) लागू हुआ, तब मोदी ने पहली बार अपनी अद्वितीय रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया। वे पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए कभी सिख तो कभी सन्यासी का भेष बदलकर भूमिगत रहे। इस दौरान उन्होंने प्रतिबंधित नेताओं को गुप्त सूचनाएं पहुंचाने और सरकार विरोधी साहित्य के वितरण का जिम्मा संभाला।
1987 में जब उन्हें भाजपा संगठन में भेजा गया, तो वे पार्टी के सबसे बड़े ‘क्राइसिस मैनेजर’ बनकर उभरे। 1990 की लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक ‘सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा’ और 1991 में मुरली मनोहर जोशी की ‘कन्याकुमारी से कश्मीर एकता यात्रा’ के पीछे का असली संगठनात्मक दिमाग नरेंद्र मोदी का ही था।
गुजरात का वो कालखंड: जब एक झटके में बदला देश की राजनीति का व्याकरण
अक्टूबर 2001 में जब गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप और प्रशासनिक सुस्ती के कारण केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, तब दिल्ली से नरेंद्र मोदी को गुजरात की कमान सौंपकर भेजा गया। उन्होंने बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के सीधे सूबे के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। साल 2002 के गोधरा कांड और उसके बाद हुए दंगों के भीषण राजनीतिक दबाव और चौतरफा हमलों के बीच भी मोदी ने हार नहीं मानी।
उन्होंने गुजरात की राजनीति को ‘हिंदुत्व और विकास (Vikasvaad)’ के एक नए कॉकटेल में बदल दिया। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ के जरिए उन्होंने पहली बार किसी राज्य को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट हब बनाया। 2002, 2007 और 2012 में लगातार तीन विधानसभा चुनावों में एकतरफा जीत दर्ज कर उन्होंने साबित कर दिया कि वे गुजरात के निर्विवाद नेता हैं।
2014 और 2019: लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक अभिजात्य वर्ग को चुनौती
साल 2013 में जब भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किया, तब लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि एक क्षेत्रीय नेता देश की जटिल राजनीति को नहीं समझ पाएगा। लेकिन मोदी ने पूरे देश में 4 लाख किलोमीटर से अधिक की यात्राएं और सैकड़ों रैलियां कर देश का मूड बदल दिया। ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ और ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारों ने तीन दशक से चले आ रहे गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म कर दिया और भाजपा को 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत दिलाया।
2019 में बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद राष्ट्रवाद और ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे पर सवार होकर मोदी 303 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ लौटे। इस कार्यकाल में उन्होंने अनुच्छेद 370 की समाप्ति, राम मंदिर निर्माण और तीन तलाक जैसी संघ की कोर विचारधारा के तीन सबसे बड़े वादों को पूरा कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया।
2024 की हैट्रिक और नेहरू के रिकॉर्ड की बराबरी: एक अजेय यात्रा
जून 2024 में जब नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू के 62 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड की बराबरी कर ली। गठबंधन सरकार (NDA) के सहयोगियों के साथ सत्ता चलाने की नई चुनौती के बीच भी मोदी की वैश्विक साख और कड़े फैसले लेने की क्षमता में कोई कमी नहीं आई है। वे आज भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बन चुके हैं।
चाय की दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने और ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, जिसे आने वाली पीढ़ियां भारतीय लोकतंत्र के ‘मोदी युग’ के रूप में याद रखेंगी।
