इतिहास बनाम आधुनिक नजरिया: स्वरा भास्कर का विवादित बयान और 1303 ईस्वी के चित्तौड़ का ऐतिहासिक सच
बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर सुर्खियों में हैं। दिल्ली में आयोजित एक पैनल डिस्कशन ‘वूमेन, लाइफ, फ्रीडम’ के दौरान उन्होंने साल 2018 में आई संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत के क्लाइमेक्स ‘जौहर’ दृश्य पर अपनी पुरानी टिप्पणी को दोहराया। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है और इतिहास प्रेमियों तथा राजपूत समुदाय में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि स्वरा भास्कर का पूरा बयान क्या था, उनकी सफाई क्या है, ‘जौहर’ वास्तव में क्या होता है और 1303 ईस्वी में चित्तौड़ के किले में क्या हुआ था।
स्वरा भास्कर का पूरा बयान और विवाद (The Controversy)
स्वरा भास्कर ने कार्यक्रम में पद्मावत फिल्म के उस दृश्य की आलोचना की, जहां सैकड़ों महिलाएं सामूहिक रूप से अग्नि कुंड में कूदकर आत्मदाह (जौहर) कर लेती हैं।
उनका तर्क था कि फिल्म में जौहर प्रथा का जिस तरह महिमामंडन (Glorification) किया गया है, वह आधुनिक समाज और विशेषकर यौन हिंसा (Rape Survivors) से बचे लोगों के लिए एक गलत संदेश देता है। उन्होंने चिंता जताई कि इस तरह के दृश्यों को देखकर आज की कोई बलात्कार पीड़ित महिला खुद को ‘कायर’ महसूस कर सकती है कि उसने अपनी जान क्यों नहीं दी। उन्होंने फिल्म के एक विशेष क्लोज-अप शॉट (जिसमें एक गर्भवती महिला को जौहर की तरफ बढ़ते दिखाया गया था) की आलोचना करते हुए इसे बेहद परेशान करने वाला बताया।
इस बयान के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने नाराजगी जताई। आलोचकों और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि स्वरा भास्कर मध्यकालीन क्रूरता और बलिदान के इतिहास को 21वीं सदी के आधुनिक चश्मे से देख रही हैं, जो कि राजपूत वीरांगनाओं के सर्वोच्च बलिदान और शौर्य का अपमान है।
चौतरफा घिरने के बाद स्वरा भास्कर ने सोशल मीडिया पर अपनी सफाई भी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी भी महारानी पद्मावती या चित्तौड़ की अन्य महिलाओं को ‘कायर’ नहीं कहा। उनके बयान का गलत अनुवाद और प्रचार किया गया है। उनका विरोध केवल फिल्म की सिनेमाई प्रस्तुति और आज के समाज में उसके प्रभाव को लेकर था, न कि इतिहास की उन महान महिलाओं के प्रति।
‘जौहर’ क्या होता है और यह क्यों किया जाता था? (What is Jauhar?)
‘जौहर’ शब्द संस्कृत के ‘जतुगृह’ (लाक्षागृह, जहां आग से सुरक्षा या भस्म होने का संदर्भ हो) से प्रेरित माना जाता है। मध्यकाल में राजपूत समाज में यह प्रथा एक युद्ध-काल की विवशता थी।
जब किसी राजपूत राज्य या किले पर विदेशी आक्रांताओं (विशेषकर मध्य एशिया या दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों) का आक्रमण होता था और यह निश्चित हो जाता था कि राजपूत सेना युद्ध में जीत नहीं पाएगी, तब किले के भीतर मौजूद महिलाएं अपनी अस्मिता, सम्मान और पवित्रता की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से धड़कती अग्नि में कूदकर जान दे देती थीं।
मध्यकालीन युद्धों का इतिहास गवाह है कि विजयी विदेशी सेनाएं हारने वाले पक्ष की महिलाओं को बंधक बना लेती थीं, उन्हें भयानक शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती थीं, उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता था और उन्हें ‘सेक्स स्लेव’ (यौन दासी) बनाकर हरम में रख दिया जाता था। इसी अमानवीय अपमान, दासता और जबरन धर्म परिवर्तन से बचने के लिए राजपूत वीरांगनाएं जीवित पकड़े जाने के बजाय गर्व से मृत्यु को गले लगाना बेहतर समझती थीं।
यह प्रथा अकेले नहीं होती थी। महिलाओं के अग्नि समाधि लेने के बाद, किले के पुरुष योद्धा केसरिया बाना (वस्त्र) पहनकर, अंतिम सांस तक दुश्मनों को काटने के लिए भूखे शेरों की तरह युद्ध के मैदान में कूद पड़ते थे। इस संयुक्त प्रक्रिया (महिलाओं का जौहर और पुरुषों का केसरिया) को ‘शाका’ कहा जाता था।
1303 ईस्वी: चित्तौड़ के पहले जौहर की ऐतिहासिक कहानी (Chittor’s First Jauhar)
चित्तौड़गढ़ के किले ने इतिहास में तीन बड़े जौहर देखे हैं, जिनमें से पहला और सबसे प्रसिद्ध जौहर 1303 ईस्वी में हुआ था। इसकी कहानी मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत और समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है।
दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी अपनी साम्राज्यवादी नीतियों और चित्तौड़ की अभेद्य रणनीतिक स्थिति के कारण मेवाड़ को जीतना चाहता था। लोककथाओं के अनुसार, वह चित्तौड़ के राजा रावल रतन सिंह की अत्यंत सुंदर रानी पद्मावती (पद्मिनी) को हासिल करने के लिए भी लालायित था।
खिलजी ने जनवरी 1303 में चित्तौड़ के किले को घेर लिया। यह घेराबंदी लगभग 7-8 महीनों तक चली। किले के भीतर जब रसद (भोजन-पानी) खत्म होने लगा, तब आर-पार की अंतिम लड़ाई का फैसला हुआ।
राजा रतन सिंह और उनके महान सेनापतियों (गोरा और बादल) ने अभूतपूर्व वीरता से युद्ध लड़ा, लेकिन खिलजी की विशाल सेना के सामने वे वीरगति को प्राप्त हुए। जैसे ही यह खबर किले के भीतर पहुंची, रानी पद्मावती के नेतृत्व में लगभग 16,000 राजपूत महिलाओं, बच्चों और दासियों ने खिलजी के चंगुल में फंसने के बजाय जौहर का रास्ता चुना।
जब अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के किले में विजय उल्लास के साथ प्रवेश किया, तो उसे वहां जीवित इंसानों के बजाय सिर्फ धधकती राख, धुआं और हड्डियां मिलीं। वीरांगनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा कर खिलजी के क्रूर अहंकार को धूल में मिला दिया था।
इतिहासकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि ‘जौहर’ को आज की सती प्रथा या आत्महत्या के सामान्य चश्मे से नहीं देखा जा सकता। मध्यकाल की भीषण युद्ध क्रूरताओं और अमानवीय परिस्थितियों के संदर्भ में यह महिलाओं का अपनी स्वतंत्रता और सम्मान को बचाए रखने का एक चरम, लेकिन विवशतापूर्ण प्रतिरोध था। यही कारण है कि आज भी भारतीय इतिहास में इसे कायरता नहीं, बल्कि अद्वितीय शौर्य और आत्मसम्मान का प्रतीक माना जाता है।
