झारखंड के विभिन्न जिलों में JSSC-CGL पेपर लीक, परीक्षाओं में अनिश्चितता और नियोजन नीति को लेकर छात्रों का आक्रोश चरम पर है। राज्य का युवा वर्ग अपनी वर्षों की मेहनत और भविष्य को लेकर सड़कों पर उतरा हुआ है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा और बेहद चिंतनीय पहलू यह है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर बात-बात पर लोकतंत्र और युवाओं के अधिकारों की दुहाई देने वाला राष्ट्रीय एक्टिविस्ट वर्ग और जंतर मंतर वाला मीडिया इस मुद्दे पर लगभग मौन है।
झारखंड आंदोलन का धरातल
झारखंड में छात्रों का यह आंदोलन किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी, बार-बार पेपर लीक होना और स्थानीय नियोजन नीति का स्पष्ट न होना युवाओं के धैर्य को तोड़ चुका है। राज्य में निजी क्षेत्र में सीमित अवसरों के कारण सरकारी नौकरी ही सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का प्राथमिक जरिया है। ऐसे में परीक्षाओं का रद्द होना या धांधली की भेंट चढ़ना सीधे तौर पर युवाओं के भविष्य पर कुठाराघात है।
जंतर-मंतर और राष्ट्रीय स्तर की चुप्पी का विश्लेषण
भौगोलिक और मीडिया केंद्रितता:
राष्ट्रीय मीडिया और नागरिक समाज (Civil Society) का ध्यान मुख्य रूप से दिल्ली और उसके आसपास की घटनाओं तक सीमित रहता है। जंतर-मंतर की हलचल तुरंत राष्ट्रीय सुर्खियां बनती है, जबकि रांची और हजारीबाग की सड़कों पर गूंजती छात्रों की आवाज को ‘क्षेत्रीय मुद्दा’ मानकर अनदेखा कर दिया जाता है।
राजनीतिक सुविधा और ‘चयनात्मक एकजुटता’: जंतर-मंतर पर अक्सर वही मुद्दे तूल पकड़ते हैं जो सीधे केंद्र सरकार या राष्ट्रीय विमर्श से जुड़े होते हैं। चूंकि झारखंड में राज्य स्तरीय भर्ती बोर्डों (JSSC/JPSC) और राज्य प्रशासन की विफलता का मामला है, इसलिए कई राष्ट्रीय संगठन और चेहरे अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों के तहत इस पर बोलने से कतराते हैं। यह ‘सिलेक्टिव एक्टिविज्म’ छात्र हितों के प्रति उनकी निष्ठा पर सवाल खड़े करता है।
संस्थागत नेटवर्क की कमी: दिल्ली में होने वाले प्रदर्शनों के पीछे मजबूत राष्ट्रीय यूनियनों, कानूनी विशेषज्ञों और मीडिया लॉबी का एक पूरा इकोसिस्टम काम करता है। इसके विपरीत, झारखंड का छात्र आंदोलन स्वतःस्फूर्त और स्थानीय स्तर पर केंद्रित है। राष्ट्रीय स्तर पर कोई मजबूत नेटवर्क न होने के कारण इनकी आवाज दिल्ली के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती।
निष्कर्ष
छात्रों की पीड़ा का कोई राज्य या राजनीतिक रंग नहीं होता। पेपर लीक और प्रशासनिक लाचारी चाहे किसी भी राज्य में हो, उसका शिकार देश का युवा ही होता है। जब तक देश का एक्टिविस्ट वर्ग और मीडिया क्षेत्रीय मुद्दों को अपने चश्मे से हटाकर ‘राष्ट्रीय छात्र हित’ के नजरिए से नहीं देखेगा, तब तक राज्यों में संघर्ष कर रहे छात्रों को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी।
