मिट्टी में बंदूकें बोने वाले सात साल के उस बच्चे की पूरी कहानी जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव
नई दिल्ली: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन जो स्थान शहीद-ए-आजम भगत सिंह को प्राप्त हुआ, वह अद्वितीय है। मात्र 23 वर्ष की अल्पायु में फाँसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह केवल एक साहसी क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर समाजवादी विचारक और दूरदर्शी लेखक भी थे। उनकी 119वीं जयंती के इस विशेष अवसर पर आइए जानते हैं उनके जीवन के उन महत्वपूर्ण पन्नों को, जिन्होंने देश में क्रांति की एक नई परिभाषा लिख दी।
देशभक्ति की विरासत और बचपन का वो संकल्प
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह खुद जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे, जिसके कारण देशभक्ति की भावना उन्हें घुट्टी में मिली थी। उनके बचपन की एक घटना बेहद मशहूर है जब वे महज सात साल के थे और अपने पिता के साथ खेतों में गए थे। वहां उन्होंने मिट्टी में छोटे-छोटे तिनके गाड़ना शुरू कर दिया। जब पिता ने पूछा कि यह क्या कर रहे हो, तो बालक भगत सिंह का जवाब था कि मैं मिट्टी में बंदूकें बो रहा हूँ ताकि बड़ी होकर बहुत सारी बंदूकें बनें और हम अपने देश से अंग्रेजों को भगा सकें।
जलियांवाला बाग और क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत
साल 1919 में हुए क्रूर जलियांवाला बाग हत्याकांड ने 12 वर्ष के मासूम भगत सिंह की सोच को हमेशा के लिए बदल दिया। इस नरसंहार की खबर सुनते ही वे स्कूल से भागकर सीधे अमृतसर पहुंचे। वहाँ की खून से सनी मिट्टी को उन्होंने एक कांच की बोतल में भरा और ताउम्र अपने पास रखा ताकि वह अंग्रेजों के इस जुल्म को कभी न भूलें। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से शुरुआत में जुड़ने के बाद, जब 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया, तो भगत सिंह का झुकाव सशस्त्र क्रांति की ओर बढ़ गया। उन्होंने समझ लिया था कि बिना आक्रामक संघर्ष के आजादी पाना मुमकिन नहीं है।
नौजवान भारत सभा और HSRA का गठन
युवाओं को एक मंच पर लाने के लिए भगत सिंह ने साल 1926 में ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की। इसके बाद वे चंद्रशेखर आज़ाद के संपर्क में आए और दोनों ने मिलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) का पुनर्गठन किया। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना ही नहीं था, बल्कि एक ऐसे भारतीय समाज की स्थापना करना था जहाँ किसी भी गरीब, मजदूर या किसान का शोषण न हो। भगत सिंह लगातार किताबें पढ़ते थे और कार्ल मार्क्स व लेनिन जैसे विचारकों से बेहद प्रभावित थे।
सांडर्स वध: लाला लाजपत राय की मौत का प्रतिशोध
साल 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो पूरे देश में इसका कड़ा विरोध हुआ। लाहौर में इस विरोध प्रदर्शन की कमान महान नेता लाला लाजपत राय संभाल रहे थे। ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिससे लाला जी गंभीर रूप से घायल हो गए और कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद ने एक गुप्त योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को लाहौर पुलिस मुख्यालय के बाहर इन क्रांतिकारियों ने सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। इस घटना ने ब्रिटिश खुफिया तंत्र को पूरी तरह फेल कर दिया था।
दिल्ली असेंबली में बम धमाका: बहरों को सुनाने की गूंज
सांडर्स वध के बाद अंग्रेज सरकार आम जनता के अधिकारों को कुचलने के लिए ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ जैसे दमनकारी कानून पास करने की तैयारी में थी। इसके विरोध में भगत सिंह ने एक ऐसी ऐतिहासिक योजना बनाई जिसका मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि सोई हुई सरकार को जगाना था। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली (वर्तमान संसद भवन) में खाली बेंचों पर कम तीव्रता वाले दो बम फेंके। बम धमाके के साथ ही उन्होंने हवा में पर्चे उछाले जिन पर लिखा था कि ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है’। धमाके के बाद वे चाहते तो आसानी से भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने वहीं खड़े रहकर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘साम्राज्यवाद का नाश हो’ के नारे लगाए और स्वेच्छा से अपनी गिरफ्तारी दे दी।
जेल की ऐतिहासिक भूख हड़ताल और वैचारिक लेखन
जेल जाने के बाद भी भगत सिंह का संघर्ष थमा नहीं। लाहौर सेंट्रल जेल में उन्होंने देखा कि भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा था, जबकि यूरोपीय कैदियों को अच्छी सुविधाएं मिल रही थीं। इसके खिलाफ भगत सिंह ने जेल में ही ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरू कर दी, जो 64 दिनों तक चली। इस दौरान अंग्रेजी प्रशासन ने उन्हें जबरन दूध पिलाने की हर कोशिश की, लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। जेल के भीतर ही उन्होंने अपने सबसे प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ (Why I am an Atheist) की रचना की, जो आज भी दुनिया भर के विचारकों के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज है।
23 मार्च 1931: वो अमर शहादत जिसने इतिहास बदल दिया
लाहौर षड्यंत्र केस के तहत अदालत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाई। इन तीनों नौजवानों की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह भड़कने का डर पैदा हो गया था। इसी खौफ के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने कानूनी नियमों को ताक पर रखकर, तय तारीख (24 मार्च 1931) से एक दिन पहले ही यानी 23 मार्च 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर तीनों वीरों को गुपचुप तरीके से फाँसी दे दी। फाँसी के फंदे पर झूलने से पहले तीनों दोस्त मुस्कुरा रहे थे और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गा रहे थे। भले ही अंग्रेजों ने उनके शरीर को खत्म कर दिया, लेकिन भगत सिंह का दिया नारा ‘इंकलाब जिंदाबाद’ आज भी हर भारतीय के रगों में देशभक्ति बनकर दौड़ता है।
