विशेष रिपोर्ट: बिलासपुर-अंबिकापुर के शूटरों के साथ जंगल में ‘मंगल’, आधुनिक हथियारों से छलनी हो रहे बेगुनाह वन्यजीव, DFO की जानकारी के बावजूद कार्रवाई सिफर!
पाली/घुनघुटी (उमरिया):
मध्य प्रदेश के उमरिया जिले का घुनघुटी वन परिक्षेत्र इन दिनों वन्यजीवों के लिए कत्लगाह बना हुआ है। जहां सरकार बाघों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करती है, वहीं घुनघुटी में कानून की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। खबर है कि इलाके के रसूखदार ‘दादा’ और उनके करीबी साथी ‘मियां भाई’ ने जंगल को अपनी जागीर समझ लिया है।
1. शिकार के बाद जंगल में ‘जश्न’: कानून का कोई डर नहीं
सूत्रों से प्राप्त जानकारी और वायरल हो रही तस्वीरों ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। यह केवल शिकार का मामला नहीं है, बल्कि शिकार के बाद इन वन्यजीवों के मांस पर होने वाली ‘पार्टियों’ का है। आरोपी इतने निडर हैं कि वे शिकार करने के बाद जंगल के भीतर ही ‘मंगल’ (जश्न) मनाते हैं। हाल ही में एक सांभर के शिकार की घटना ने ग्रामीणों के बीच आक्रोश पैदा कर दिया है। बताया जा रहा है कि एक हफ्ते पहले मारे गए इस सांभर के मांस का बंदरबांट किया गया, लेकिन स्थानीय वन अमला चैन की नींद सोता रहा।
2. इंटर-स्टेट गिरोह: बिलासपुर और अंबिकापुर के कनेक्शन
घुनघुटी के यह शिकारी अकेले नहीं हैं। इनके तार छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और अंबिकापुर से जुड़े हुए हैं। रसूखदार लोग लग्जरी गाड़ियों में भरकर घुनघुटी पहुँचते हैं।
बाहरी शूटरों की फौज: बताया जा रहा है कि शिकार के लिए पेशेवर शूटरों को बुलाया जाता है।
अत्याधुनिक हथियारों का जखीरा: ‘दादा’ के पास आधुनिक हथियारों का बड़ा भंडार होने की बात सामने आई है। सवाल यह है कि वन विभाग की चौकियों और नाकों को पार करके ये हथियार और बाहरी लोग जंगल के कोर एरिया तक कैसे पहुँच रहे हैं?
3. DFO उमरिया और विभागीय सुस्ती पर सवाल
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे खूनी खेल की जानकारी उमरिया डीएफओ (DFO) के कानों तक पहुँच चुकी है। बावजूद इसके, अब तक किसी की गिरफ्तारी न होना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
क्या अधिकारियों को किसी बड़े राजनीतिक दबाव का डर है?
क्या विभागीय मिलीभगत के कारण इन शिकारियों को ‘अभयदान’ मिला हुआ है?
अधिकारी केवल “जांच चल रही है” और “जल्द कार्रवाई होगी” का रटा-रटाया जवाब दे रहे हैं, जबकि शिकारी अगले शिकार की योजना बना रहे हैं।
4. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धज्जियां
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सांभर या किसी भी वन्यजीव का शिकार करना गैर-जमानती अपराध है, जिसमें 7 साल तक की सजा का प्रावधान है।
”घुनघुटी में जो हो रहा है वह सीधे तौर पर कानून को चुनौती है। अगर इन शिकारियों के पास आधुनिक हथियार हैं, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा और वन रक्षकों की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है।”
5. ग्रामीण और पर्यावरण प्रेमियों की चेतावनी
इलाके के ग्रामीणों का कहना है कि शिकार की चर्चा हर गली-चौराहे पर है। यदि 48 घंटे के भीतर दोषियों को गिरफ्तार नहीं किया गया और ‘दादा-मियां भाई’ के हथियारों की जब्ती नहीं हुई, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन करेंगे। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जंगल में गोलियों की गूंज सुनाई देती है, लेकिन वन रक्षक अपने दफ्तरों से बाहर नहीं निकलते।
महा-विस्फोट: घुनघुटी के जंगलों में ‘रक्तचरित्र’, दादा और मियां भाई की जोड़ी कर रही बेखौफ शिकार; क्या सो रहा है उमरिया वन विभाग?
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