13 अगस्त 1951 की वह सुबह बेंगलुरु के हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड (HAL) के रनवे पर आम दिनों जैसी नहीं थी। हवा में एक अजीब सी हलचल थी, और वहां मौजूद हर शख्स के चेहरे पर उम्मीद और घबराहट का मिला-जुला भाव था। आज भारत के विमानन इतिहास का एक नया अध्याय लिखा जाने वाला था।
हैंगर के ठीक बाहर एक छोटा, सफ़ेद और चमकदार विमान खड़ा था—’हिंदुस्तान ट्रेनर-2′ (HT-2)। यह सिर्फ धातुओं और इंजनों से बना एक ढांचा नहीं था, बल्कि आज़ाद भारत के इंजीनियरों के सपनों, रातों की नींद और अथक परिश्रम का साकार रूप था। भारत के महान विमान डिजाइनर डॉ. विष्णु माधव घाटेगे अपनी टीम के साथ विमान के पास खड़े थे। उनकी आँखें विमान को इस तरह देख रही थीं जैसे कोई पिता अपने बच्चे को अपनी पहली स्वतंत्र उड़ान के लिए तैयार होते देख रहा हो।
“घाटेगे साहब, सब कुछ ठीक लग रहा है। सारे चेकलिस्ट पूरे हो चुके हैं,” मुख्य मैकेनिक ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।
डॉ. घाटेगे ने मुस्कुराकर उसके कंधे पर हाथ रखा, “यह हमारी परीक्षा नहीं है, दोस्त। यह इस देश के सामर्थ्य की परीक्षा है। हमने इसे अपने हाथों से बुना है।”
तभी टेस्ट पायलट कैप्टन नामजोशी अपने फ्लाइंग सूट में मुस्कुराते हुए आगे बढ़े। उनके चेहरे पर एक अनुभवी पायलट का आत्मविश्वास था, लेकिन उनके दिल की धड़कनें भी तेज थीं। वे कॉकपिट में बैठे, बेल्ट बांधी और इंस्ट्रूमेंट पैनल पर हाथ फिराया। हर स्विच, हर डायल भारत में ही बना था।
कैप्टन ने थम्स-अप का इशारा किया। डॉ. घाटेगे ने रनवे खाली करने का निर्देश दिया।
जब इंजन चालू हुआ, तो उसकी गड़गड़ाहट बेंगलुरु के आसमान में गूंज उठी। रनवे के दोनों ओर सैकड़ों कर्मचारी, वैज्ञानिक और उनके परिवार उत्सुकता से खड़े थे। विमान ने धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू किया। कैप्टन नामजोशी ने थ्रॉटल को आगे बढ़ाया, और विमान रनवे पर तेजी से दौड़ने लगा।
पलक झपकते ही, HT-2 के पहियों ने जमीन छोड़ दी। वह हवा में उठ गया!
नीचे खड़े लोगों की सांसें एक पल के लिए थम गईं। डॉ. घाटेगे ने अपनी मुट्ठियां कस लीं। और जैसे ही विमान ने आसमान में एक खूबसूरत मोड़ लिया, पूरा HAL परिसर तालियों और ‘जय हिंद’ के नारों से गूंज उठा। कई बूढ़े इंजीनियरों की आँखों में आँसू थे।
कैप्टन नामजोशी ने आसमान में कुछ चक्कर लगाए, विमान के संतुलन को परखा और फिर बेहद कुशलता के साथ उसे वापस रनवे पर उतार लिया। जैसे ही विमान रुका, लोग दौड़कर उसकी तरफ बढ़े। कैप्टन कॉकपिट से बाहर निकले और उन्होंने डॉ. घाटेगे को गले लगा लिया।
यह सिर्फ एक विमान की उड़ान नहीं थी। 13 अगस्त 1951 के उस ऐतिहासिक दिन, भारत ने साबित कर दिया था कि वह न सिर्फ अपनी आजादी की रक्षा कर सकता है, बल्कि आधुनिक तकनीक के आसमान में अपने दम पर उड़ान भी भर सकता है। ‘हिंदुस्तान ट्रेनर-2’ ने भारत के आत्मनिर्भर बनने के सफर को पंख दे दिए थे।
