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1928: वो आंदोलन जिसने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ बनाया

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बारदोली सत्याग्रह 1928: वो आंदोलन जिसने वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ बनाया और अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर कर दिया

स्वतंत्रता संग्राम विशेष जब भी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की बात होती है, तो अक्सर बड़े पैमाने पर हुई हिंसा या बड़े राजनीतिक समझौतों का जिक्र होता है।

लेकिन इतिहास में एक ऐसा भी आंदोलन दर्ज है जो पूरी तरह अनुशासित, अहिंसक और रणनीतिक था। यह कहानी है साल 1928 के बारदोली सत्याग्रह की। यह आंदोलन इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे बिना एक भी गोली चलाए, सही रणनीति और अटूट एकता के बल पर ब्रिटिश हुकूमत को घुटनों पर लाया जा सकता है।

आंदोलन की वजह: अंग्रेजों का मनमाना टैक्सयह घटना गुजरात के सूरत जिले के बारदोली तालुका की है। साल 1925 में बारदोली में भयंकर बाढ़ आई और उसके बाद सूखा पड़ा, जिससे किसानों की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। किसान दाने-दाने को मोहताज थे।

ऐसी विकट परिस्थिति में भी ब्रिटिश सरकार ने संवेदनहीनता दिखाते हुए बारदोली के किसानों पर लगान (Tax) में 30 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी कर दी। किसानों ने सरकार से लगान कम करने की गुहार लगाई, लेकिन अंग्रेजों ने उनकी एक न सुनी।

इसके बाद किसानों ने तय किया कि वे इस अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे और उन्होंने वल्लभभाई पटेल को इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया।वल्लभभाई पटेल की अचूक रणनीति वल्लभभाई पटेल ने आंदोलन की कमान संभालते ही इसे एक सैन्य अभियान की तरह व्यवस्थित किया। उनकी रणनीति इतनी अचूक थी कि अंग्रेज अधिकारी भी हैरान रह गए

तालुका का विभाजन: पटेल ने पूरे बारदोली क्षेत्र को 13 शिविरों (Camps) में बांट दिया और हर शिविर में एक अनुभवी नेता को तैनात किया।

‘कर मत दो’ का संकल्प: उन्होंने सभी किसानों को पवित्र ग्रंथों और ईश्वर की शपथ दिलाई कि कोई भी किसान बढ़े हुए टैक्स का एक भी पैसा अंग्रेजों को नहीं देगा।गुप्त सूचना तंत्र: अंग्रेजों की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए युवाओं का एक खुफिया नेटवर्क तैयार किया गया।

जब भी ब्रिटिश अधिकारी जब्ती करने गांव में आते, ढोल बजाकर पूरे गांव को सतर्क कर दिया जाता था और किसान अपने मवेशियों के साथ जंगलों में छिप जाते थे। अधिकारियों को पूरा गांव खाली मिलता था।

सख्त सामाजिक बहिष्कार: यदि कोई व्यक्ति चोरी-छिपे अंग्रेजों को टैक्स देने की कोशिश करता, तो पूरा समाज उसका हुक्का-पानी बंद कर देता था। इस एकता के आगे अंग्रेज पूरी तरह बेबस हो गए।महिलाओं का ऐतिहासिक योगदान और ‘सरदार’ की उपाधिइस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यहाँ की महिलाएं थीं।

पुरुषों के जेल जाने के बाद महिलाओं ने आंदोलन की कमान संभाली। वे न केवल खुद डटी रहीं, बल्कि उन्होंने अपने पिंजरों और मवेशियों को कुर्बान कर दिया लेकिन अंग्रेजों के सामने सिर नहीं झुकाया।

वल्लभभाई पटेल के इस अदम्य संगठन कौशल और दृढ़ता को देखकर बारदोली की महिलाओं ने उन्हें ‘सरदार’ (यानी सबका नेता) कहकर पुकारा। इसके बाद ही महात्मा गांधी ने भी उन्हें आधिकारिक रूप से ‘सरदार’ की उपाधि दी, और वे हमेशा के लिए सरदार पटेल बन गए।

अंग्रेजों की हार और अंतिम परिणाम अंग्रेजों ने आंदोलन को कुचलने के लिए किसानों की जमीनें कुर्क कीं, उनके मवेशियों को जब्त किया और उन्हें जेल में डाला। लेकिन किसानों का हौसला नहीं टूटा। आखिरकार, ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने मामले की जांच के लिए ‘ब्रूमफील्ड और मैक्सवेल’ की एक समिति बनाई।

जांच के बाद समिति ने माना कि 30% की बढ़ोतरी पूरी तरह गलत थी। सरकार ने टैक्स को घटाकर मात्र 6.03 प्रतिशत कर दिया। इसके साथ ही किसानों की जब्त की गई सारी जमीनें और मवेशी उन्हें ससम्मान वापस लौटा दिए गए।

निष्कर्षबारदोली सत्याग्रह केवल टैक्स माफी की लड़ाई नहीं था, इसने पूरे देश के भीतर यह विश्वास जगाया कि यदि जनता एकजुट और अनुशासित हो, तो दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत को भी हराया जा सकता है। यह आंदोलन सरदार पटेल के कुशल नेतृत्व और भारतीय किसानों के त्याग का अमर प्रतीक है।जय हिंद! जय भारत!

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