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आज़ादी के 79 साल पूरे होने को हैं… लेकिन क्या सच में देश आज़ाद है, अगर इसके छोटे-छोटे नागरिक अब भी अपने बचपन से आज़ाद नहीं हो पाए?
ये तस्वीरें किसी एक होटल की नहीं… बल्कि भारत की कई गलियों, चौराहों और दुकानों की सच्चाई हैं।
18 साल से कम उम्र के ये बच्चे — जिनके हाथ में किताबें और कॉपी-कलम होनी चाहिए — उनके हाथ में है ट्रे, बर्तन और झाड़ू।
ये बच्चे अपने सपनों को छोड़… मजबूरी का बोझ ढो रहे हैं। जबकि मंच पर बैठकर नेता ‘भारत के उज्ज्वल भविष्य’ की बातें करते हैं, जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
एक आम नागरिक के लिए ये कोई आंकड़ा नहीं… बल्कि रोज़ की हकीकत है।
बालश्रम न सिर्फ एक अपराध है… बल्कि बच्चों के बचपन और देश के भविष्य की चोरी है।
सवाल सिर्फ इतना है — आज़ादी के इतने साल बाद भी, क्या हम इन बच्चों को उनके बचपन की आज़ादी दिला पाए हैं?
क्योंकि जब तक हर बच्चा स्कूल में नहीं, तब तक हमारी आज़ादी अधूरी है।