18 August Special: क्या ताइवान के उस विमान हादसे में सचमुच खत्म हो गया था नेताजी का सफर
आज 18 अगस्त है। इतिहास का एक ऐसा पन्ना, जो हर साल आते ही देशवासियों के दिलों में एक कसक और दिमाग में कई अनुत्तरित सवाल छोड़ जाता है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, आज ही के दिन साल 1945 में भारत के सबसे बड़े महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ताइवान के ताइहोकु हवाई अड्डे पर एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था। लेकिन क्या वाकई ऐसा हुआ था? आइए इस विशेष लेख में खंगालते हैं इतिहास के उस सबसे बड़े रहस्य को, जिसने दशकों से इतिहासकारों और दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों को उलझा रखा है।
वह रहस्यमयी दोपहर और विमान क्रैश की आधिकारिक कहानी
जापानी सरकार और तत्कालीन सैन्य रिपोर्टों के अनुसार, 18 अगस्त 1945 की दोपहर करीब 2:30 बजे ताइहोकु (अब ताइपे, ताइवान) सैन्य हवाई अड्डे पर एक बड़ी दुर्घटना हुई। बताया जाता है कि नेताजी एक जापानी बॉम्बर विमान से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे। उड़ान भरते ही विमान का प्रोपेलर टूट गया और वह संतुलन खोकर क्रैश हो गया। जापानी रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस हादसे में नेताजी के कपड़ों में आग लग गई थी, जिसके कारण वे बुरी तरह झुलस गए थे। उन्हें तुरंत नजदीकी सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसी रात उन्होंने अंतिम सांस ली।
वो बड़े सवाल जो विमान हादसे की थ्योरी पर उठाते हैं उंगली
भले ही कागजों पर इस दुर्घटना को सच मान लिया गया, लेकिन खोजी पत्रकारों और इतिहासकारों के मन में हमेशा कुछ गंभीर सवाल खटकते रहे। सबसे बड़ा सवाल यह था कि इतने बड़े वैश्विक नेता की मृत्यु और उनके अंतिम संस्कार की एक भी प्रामाणिक या स्पष्ट तस्वीर कभी दुनिया के सामने क्यों नहीं आई?
इस शक को तब और मजबूती मिली जब साल 1999 में गठित भारत सरकार के जस्टिस मुखर्जी आयोग ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। आयोग ने ताइवान सरकार के तत्कालीन रिकॉर्ड खंगाले और अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि 18 अगस्त 1945 को ताइपे में कोई विमान दुर्घटना दर्ज ही नहीं थी। इसके अलावा हादसे में सुरक्षित बचे नेताजी के करीबी सहयोगी कर्नल हबीबुर রহমান के बयानों में भी समय और परिस्थितियों को लेकर कई विरोधाभास पाए गए, जिसने इस पूरी कहानी को संदिग्ध बना दिया।
गुमनामी बाबा से सोवियत संघ तक का रहस्यमयी सफर
जब देशवासियों ने विमान हादसे की आधिकारिक खबर को मानने से पूरी तरह इनकार कर दिया, तो नेताजी के अंतर्धान होने को लेकर कई नई थ्योरीज ने जन्म लिया। इनमें सबसे प्रमुख ‘द रशियन कनेक्शन’ है, जिसके तहत कई इतिहासकारों का मानना है कि नेताजी सुरक्षित सोवियत संघ (रूस) पहुंच गए थे ताकि वहां से आज़ादी की नई लड़ाई की रणनीति बना सकें।
वहीं दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्या) में दशकों तक रहने वाले एक रहस्यमयी साधु ‘गुमनामी बाबा’ उर्फ भगवान जी की कहानी ने पूरे देश का ध्यान खींचा। उनकी मृत्यु के बाद उनके कमरे से जो सामान मिला, उसमें नेताजी के परिवार की तस्वीरें, बंगाली किताबें और कई गोपनीय दस्तावेज शामिल थे, जिसने लोगों के इस शक को मजबूत किया कि वे ही नेताजी थे। इसके अलावा 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के शौलमारी आश्रम के एक साधु को भी नेताजी समझा गया था।
इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेंगे नेताजी
18 अगस्त 1945 को ताइवान के आसमान में वास्तव में क्या हुआ था, यह सच आज भी सरकारी फाइलों में पूरी तरह बंद है। हालांकि भारत सरकार ने हाल के वर्षों में नेताजी से जुड़ी कई गोपनीय फाइलें सार्वजनिक की हैं, लेकिन अंतिम सच तक पहुंचना अभी बाकी है। चाहे उनका सफर जैसे भी आगे बढ़ा हो, लेकिन देश को आज़ादी की दहलीज तक पहुंचाने वाले इस आज़ाद हिन्द फौज के सेनापति का जज्बा हर भारतीय के दिल में हमेशा जिंदा रहेगा। नेताजी का दिया हुआ नारा “जय हिन्द” आज भी हमारे देश की सबसे बड़ी धड़कन है।


