Home health Plus आयुर्वेदिक चिकित्सा वैश्विक पथ की प्रगति पर अग्रसर(आयुर्वेद से जीवेत शरदः शतम्)

आयुर्वेदिक चिकित्सा वैश्विक पथ की प्रगति पर अग्रसर(आयुर्वेद से जीवेत शरदः शतम्)

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23 सितम्बर, आयुर्वेद दिवस पर विशेष-

आयुर्वेदिक चिकित्सा वैश्विक पथ की प्रगति पर अग्रसर
(आयुर्वेद से जीवेत शरदः शतम्)

विश्व की प्राचीन चिकित्सा पद्ध‌तियों में आयुर्वेद चिकित्सा का गोरवशाली इतिहास रहा है। अब इस पुरातन चिकित्सा पद्धति को आधुनिकता की ओर ले जाने के निरंतर
केंद्रीय सरकार की अहम् भूमिका बनी हुई है। आयुर्वेद के जरिए गंभीर बीमारियों को भी जड़ से खत्म किया जा सकता है, इससे प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ता है ,और आम आदमी की पहुंच में भी है। आयुर्वेद के करीब दो हजार वर्ष बाद प्रचलन में आई एलोपैथी प्रयोग और अनुसंधान के दम पर काफी आगे निकल गयी। जिस एलौपैथी चिकित्सा पद्धति का आज बोलबाला है, 17 वीं शताब्दी तक इसकी कोई पहचान नहीं थी। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सबसे पुरानी पद्धति इन दिनों काफी प्रिय हो रही है । इसकी इतनी विशेषता है, कि प्राकृतिक तरीके से रोगी का उपचार किया जाता है। वैश्विक स्तर पर इसकी स्वीकार्यता बढ़ गई है। वैसे भारत में आयुर्वेद होम्यौ पैथ या यूनानी की मान्यता और इसके प्रति लोगों का भरोसा प्राचीन काल से ही रहा है। अब इस आयुर्वेद चिकित्सा विधा के बढ़ते विश्वास से आयुष उधोग भी लगातार बढ़ रहे हैं। आठ-दस साल पहले 20 हजार करोड़ रु. का कारोबार था ,जो बढ़‌कर 1.50 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।
केन्द्र सरकार ने अब आयुर्वेद दिवस 23 सितंबर को मनाने का फैसला विगत वर्ष में ही लिया है। पहले इसे हर साल धन्वंतरि जयंती (धनतेरस) के दिन के दिन मनाया जाता था। आयुष आयुर्वेद राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा”आयुर्वेद केवल इलाज की पद्धती नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है।”गोवा में 302 करोड़ से बन रहे– भारतीय आयुर्वेद संस्थान को चिकित्सा पर्यटन के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। गोवा मैं आयुर्वेदिक चिकित्सा का यह परिसर 50 एकड़ का होगा ।यह अत्याधिक संस्थान है, इस संस्थान में अध्ययन, अध्यापन, वह आधुनिक चिकित्सा से परिपूर्ण होगा।
आयुष के क्षेत्र में असीम संभावनार जन्म ले रही है। औषधीय पौधों की खेती से लेकर स्टार्टअप तक आयुष इंडस्ट्री की बड़ी ताकत है। भारत में इस समय आयुष इंडस्ट्री पर आधारित करीब 40 हजार लघु उद्योग कार्यरत हैं ।प्रतिवर्ष 14 -15 प्रतिशत भारतीय आयुष उद्योग के आगे बढ़ने का अनुमान है। इससे अधिक रोजगार की संभावनाएं बनती हैं। उम्मीद है, कि 5.5 लाख नौकरियां आयुर्वेदिक इंडस्ट्री से उत्पन्न हो सकती है।
आयुर्वेद के सिद्धानों के पालन से बढ़ती है, रोग प्रतिशोध समता क्योंकि आयुर्वेद में लहसुन, हल्दी, मुलेठी, तुलसी के सेवन के अलावा गर्म पानी का सेवन, भाप और अणु तेल से बेहतर स्वास्थ्य प्राप्र किया जा सकता है। इसके लिए आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह लेनी बेहतर होगा। आयुर्वेदाचार्य डी. परमेश्वर अरोड़ा के अनुसार 4 मुनक्का, 4 काली मिर्च और एक चुटकी हल्दी रात में दूध के साथ पिए। इसरे अलावा शीतोपलादि चूर्ण, च्यवनप्राश का सेवन भी लाभदायक होगा। कुछ भी खाएं, लेकिन उसकी गुणवत्ता , मात्रा संयोजन सेवन के तरीके और सेवन के समय की जानकारी से ही लेवे तभी उसका लाभ मिलेगा।- आयुर्वेद का मानना है कि पूरा ब्रह्मांड पांच तत्वों से मिलकर बना है। इनमें वायु, जल, आकाश, पृथ्वी व अग्नि शामिल हैं। आयुर्वेद में इन्हें पंच महाभूत कहा गया है। मनुष्य के शरीर में तीन विकार पैदा होते हैं- पित्त दोष, – वात दोष व कफ दोष। इन्हें त्रिदोष कहा जाता है, जो पांच उपदोषों के साथ मिलकर शारीरिक क्रिया को नियंत्रित करते हैं। आयुर्वेद का मानना है कि मनुष्य के शरीर में सप्तधांतु (सात ऊतक) हैं- रस, मेद, रक्त, मज्जा, अस्थि, मम्स व शुक्र। इनके अलग-अलग काम हैं और रोगों के निदान में भी इनकी महती भूमिका होती है।
दुनिया के 50 फीसद लोगों को ही आवश्यक चिकित्सा मिल रही है। महज 250 साल पुरानी ऐलोपैथी से भारत में सिर्फ 40 फीसदी लोग ही इलाज पा रहे है। सभी लोगों का इलाज करने का एक मात्र रास्ता और सुलभ तरीका आयुर्वेद है। बड़े-बड़े नर्सिंग होम में आज भी 80 फीसदी से ज्यादा आयुर्वेद चिकित्सक ही सेवा दे रहे है। भारत में 60 फीसदी मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था भी आयुष चिकित्सा में द्वारा की जा रही है। वैसे तो आयुर्वेद के जो चिकित्सक सर्जरी करने में सक्षम है, वे जरूर कर रहे है।

आयुर्वेद चिकित्सा को बढ़ावा देने के लि सरकारी प्रयास निरंतर जारी है. फिर भी कई डाक्टरों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रिया में आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति नकारात्मक व सकारात्मक चिंतन भी किया है। चिंतन का तथ्य यह है कि लंबा समय बीत जाने के बाद इस पद्धति को बढ़ावा नहीं मिला। उल्टे ऐलौपैथी को ही प्रोत्साहन मिल रहा है। किसी ने कहा आयुर्वेद सिर्फ अभियान और बयानबाजी तक सीमित है। अब आयुर्वेद को देश के गौरव के रूप में आगे ले जाना चाहिए, क्योंकि आयुर्वेद भारत की प्राचीन धरोहर है

आम जनता में आयुर्वेद के प्रति जागरूकता के लिए स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी दफ्तरों में आयुर्वेद पद्धति के कैंपो को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। क्योंकि आयुर्वेद सिर्फ औषधीयो के सेवक पर जोर नहीं’ देता, बल्कि यह हमें ऋतुओं के अनुकूल जीवनयापन सीखना है, जिससे शरीर निरोगी रहे।
डॉ. बी. आर. नलवाया मंदसौर ,मप्र 458001

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