अक्टूबर 2009 की एक ठंडी सुबह कर्नाटक पुलिस की एक स्पेशल टीम ने मेंगलुरु के पास एक सामान्य से दिखने वाले शख्स को घेरा। हुलिए से वह किसी स्कूल का मास्टर या क्लर्क नजर आ रहा था। लेकिन जब पुलिस ने उसकी जेब की तलाशी ली, तो अधिकारियों के होश उड़ गए। उसकी जेब से कोई पिस्तौल या चाकू नहीं, बल्कि चांदी के वर्क में लिपटी कुछ अजीब सी गोलियां और 4 अलग-अलग नाम के फर्जी आईडी कार्ड्स बरामद हुए।
पुलिस को तब तक अंदाजा नहीं था कि उन्होंने जिस शख्स को सलाखों के पीछे भेजा है, वो कोई मामूली ठग नहीं, बल्कि भारतीय क्राइम हिस्ट्री का सबसे शातिर और ठंडे दिमाग से कत्ल करने वाला सीरियल किलर ‘सायनाइड मोहन’ है [सायनाइड मोहन]। एक ऐसा दरिंदा, जिसने बिना एक भी बूंद खून बहाए, सिर्फ एक ‘गुलाबी गोली’ के दम पर 20 से ज्यादा मासूम लड़कियों को मौत की नींद सुला दिया था
शैतानी ‘मोडस ऑपेरंडी’: बिना दहेज की शादी का झांसा
कर्नाटक पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश की गई चार्जशीट के अनुसार, मोहन कुमार का शिकार चुनने और उसे ठिकाने लगाने का तरीका इतना सटीक और क्रूर था कि police भी सालों तक गचक खाती रही।
मोहन का निशाना हमेशा 22 से 30 साल की वो गरीब या मध्यमवर्गीय लड़कियां होती थीं, जिनकी शादियां दहेज या पैसों की तंगी की वजह से नहीं हो पा रही थीं। वह बस स्टैंड्स या पब्लिक प्लेस पर उनसे मिलता, अपना फर्जी नाम बताता और खुद को एक शरीफ सरकारी टीचर या रईस बिजनेसमैन साबित करता। वह लड़कियों को विश्वास दिलाता कि वह उनसे बिना कोई दहेज लिए भागकर मंदिर में शादी करने को तैयार है।
होटल का कमरा और बस स्टैंड का ‘डेथ ट्रैप’
इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक, मोहन लड़कियों को घर से अपने सारे सोने के गहने और नकदी समेटकर आने को कहता था। इसके बाद वह उन्हें अपने साथ मैसूर, मडिकेरी या हसन के किसी अनजान लॉज में ले जाता। वहां रात बिताने के बाद, अगली सुबह वह कहता कि वे मंदिर जा रहे हैं, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से लड़की अपने सारे गहने लॉज के कमरे में ही छोड़ दे।
मंदिर ले जाने के बहाने वह लड़की को शहर के सबसे व्यस्त बस स्टैंड पर लाता। वहां वह लड़की को एक गुलाबी या सफेद गोली थमाता और फुसफुसाकर कहता:
“यह गर्भनिरोधक (Anti-Pregnancy) दवा है। कल रात जो हुआ, उसके बाद यह जरूरी है। इसे बस स्टैंड के महिला टॉयलेट के अंदर जाकर ही खाना, क्योंकि इसे खाने के तुरंत बाद भयंकर उल्टी आती है।”
मासूम लड़की मोहन की बात पर भरोसा करके टॉयलेट के अंदर जाती, दरवाजा बंद करती और गोली जीभ पर रख लेती। वो गोली कोई दवा नहीं, बल्कि पोटेशियम सायनाइड (Potassium Cyanide) थी। जहर जीभ पर लगते ही महज 90 सेकंड के भीतर लड़की का नर्वस सिस्टम ठप हो जाता और वह वहीं दम तोड़ देती। बाहर खड़ा मोहन तुरंत लॉज लौटता, गहने समेटता और अगले शिकार की तलाश में निकल जाता।
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वो एक गलती जिसने कातिल को बेनकाब किया
सालों तक मैसूर, बेंगलुरु और हसन के बस स्टैंड्स पर बंद टॉयलेट्स में लड़कियों की लाशें मिलती रहीं। चूंकि दरवाजा अंदर से बंद होता था, जिस्म पर चोट के निशान नहीं होते थे और गहने लॉज में छूटे होने के कारण पुलिस को मौके से लूट का पता नहीं चलता था, इसलिए पुलिस इसे ‘रहस्यमयी आत्महत्या’ मानकर केस क्लोज कर देती थी।
द टर्निंग पॉइंट (2009):
बंतवाल की रहने वाली 22 वर्षीय अनिता अचानक गायब हो गई। इस बार बंतवाल पुलिस ने एक लीक से हटकर काम किया। उन्होंने अनिता के मोबाइल फोन के डिलीटेड कॉल रिकॉर्ड्स (CDR) और टावर लोकेशन को ट्रैक किया। पुलिस ने देखा कि अनिता के गायब होने वाले दिन एक ही नंबर से उसे लगातार कॉल आए थे और उस नंबर की लोकेशन ठीक वही थी, जहां अनिता की लाश मिली थी। जब उस सिम कार्ड के मालिक को ट्रेस किया गया, तो वो फर्जी निकला, लेकिन police ने उस फोन के IMEI नंबर को सर्विलांस पर डाल दिया। जैसे ही मोहन ने उस फोन में दूसरी सिम डाली, पुलिस ने उसकी सटीक लोकेशन ट्रैक करके उसे दबोच लिया।
कोर्ट रूम ड्रामा और अदालत का अंतिम फैसला
जब मोहन कुमार को अदालत में पेश किया गया, तो उसने खुद को बेगुनाह बताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। उसने वकीलों की मदद लेने से इंकार कर दिया और कोर्ट में अपना केस खुद (In-Person) लड़ा। वह जजों के सामने दलील देता था कि लड़कियां खुद अपनी मर्जी से सायनाइड खाकर जान देती थीं, उसका इससे कोई लेना-देना नहीं है।
लेकिन अभियोजन पक्ष (Prosecution) के पास इस बार अकाट्य सबूत थे:
- द ज्वैलर की गवाही: पुलिस ने उस सुनार को ढूंढ निकाला, जिससे मोहन कुमार सोने की पॉलिश करने के बहाने चुपके से पोटेशियम सायनाइड खरीदता था। सुनार सरकारी गवाह बन गया।
- फॉरेंसिक रिपोर्ट: मृतकाओं के विसरा (Viscera) सैंपल में सायनाइड के पुख्ता अंश मिले।
- रिकवरी: मोहन के घर से मारी गई लड़कियों के वो गहने बरामद हुए, जिन्हें उसने अभी तक बेचा नहीं था।
अंतिम फैसला:
मंगलुरु की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने मोहन कुमार को कई हत्याओं के मामलों में फांसी की सजा सुनाई थी [सायनाइड मोहन]। हालांकि, बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उसकी सजा को संशोधित करते हुए उसे आजीवन कारावास (ताउम्र जेल की सजा) में बदल दिया [सायनाइड मोहन]। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह शख्स समाज के लिए एक बदनुमा दाग है और इसे अपनी आखिरी सांस तक जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।
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