दिल्ली विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी फुंका भी नहीं है, लेकिन चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है. इस बार सियासी घमासान किसी रैली या मंच से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के उस ‘डिजिटल फिल्टर’ से पैदा हुआ है जिसने दिल्ली की वोटर लिस्ट को हिलाकर रख दिया है. निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत जब डेटा शुद्धिकरण की मशीन चली, तो इसकी जद में कोई आम वोटर ही नहीं, बल्कि देश की सत्ता और विपक्ष के सबसे कद्दावर चेहरे भी आ गए.
सड़क से संसद तक हड़कंप: आखिर लिस्ट में कौन-कौन फंसा?
जब चुनाव आयोग ने तकनीकी खामियों और ‘अनमैप्ड डेटा’ (Logical Discrepancies) की सूची जारी की, तो लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में सन्नाटा पसर गया. इस सूची में देश के विदेश मंत्री एस. जयशंकर, भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी, और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत उनके पूरे परिवार का नाम शामिल है. हद तो तब हो गई जब दिल्ली की मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, सीबीआई के मौजूदा डायरेक्टर प्रवीण सूद और पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे दिग्गजों को भी सिस्टम-जनरेटेड नोटिस थमा दिए गए.
विपक्ष ने इसे चुनावी साल में ‘वोटर लिस्ट से नाम काटने की साजिश’ करार देकर माहौल गरमा दिया है, खासकर आम आदमी पार्टी ने केजरीवाल के पूरे परिवार का नाम ‘अनमैप्ड’ सूची में होने पर तीखे सवाल खड़े किए हैं.
आयोग की दलील: नाम काटना नहीं, ‘डेटा की सफाई’ है मकसद
चौतरफा घिरने के बाद दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को खुद मोर्चे पर आना पड़ा. आयोग ने बेहद नपे-तुले शब्दों में स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा है कि “नोटिस जारी करने का मतलब नाम काटना कतई नहीं है.”
Inside Story यह है कि यह पूरा बखेड़ा साल 2002 के पुराने ‘बेंचमार्क रोल’ (Benchmark Roll) से मौजूदा डेटा का मिलान न होने के कारण खड़ा हुआ है. इसे चुनाव आयोग की भाषा में ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ कहा जा रहा है, यानी वो तकनीकी खामियां जहां नाम की स्पेलिंग, उम्र या पते का मिलान पुराने डिजिटल रिकॉर्ड से नहीं हो पाया. प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और सीएम रेखा गुप्ता ने अपने जरूरी कागजात जमा कराकर इस विसंगति को तुरंत ठीक भी करवा लिया है.
बज चुकी है अंतिम चेतावनी की घंटी
यह मामला सिर्फ वीआईपी तक सीमित नहीं है, दिल्ली के करीब 33.13 लाख मतदाता इस नोटिस की जद में हैं. लोकतंत्र के इस सबसे बड़े शुद्धिकरण अभियान के लिए आयोग ने सख्त समय-सीमा तय कर दी है:
- 20 और 27 सितंबर (रविवार): दिल्ली के सभी पोलिंग बूथों पर विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं, ताकि लोग मौके पर ही अपने दस्तावेज वेरिफाई करा सकें.
- 30 सितंबर 2026: फॉर्म-6 (नाम जोड़ने) और फॉर्म-8 (संशोधन) जमा करने की आखिरी तारीख है.
- 04 नवंबर 2026: इस दिन दिल्ली की वो फाइनल और त्रुटिहीन वोटर लिस्ट सामने आएगी, जो तय करेगी कि आने वाले चुनाव में कौन वोट डालेगा और कौन चूक जाएगा.
पत्रकारिता का नजरिया:
तकनीकी रूप से चुनाव आयोग की यह कवायद मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने के लिए सही हो सकती है, लेकिन चुनावी मुहाने पर खड़े राज्य में एक साथ 33 लाख से ज्यादा लोगों—जिसमें देश के नीति-निर्धारक शामिल हैं—को नोटिस थमाना प्रशासनिक हड़बड़ी और लचर डिजिटल मैपिंग को भी उजागर करता है. अब देखना यह होगा कि 4 नवंबर को आने वाली फाइनल लिस्ट कितनी ‘शुद्ध’ होती है और कितनी ‘विवादमुक्त’.
