भोपाल/नई दिल्ली: क्या भारत का लोकतंत्र आज भी सिर्फ कागजों और चुनावी नारों तक सीमित है? क्या 1947 में राजा-रजवाड़ों की रियासतें और प्रिवी पर्स खत्म होने के बाद भी हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था के मूल चरित्र में कोई बुनियादी बदलाव आया? यह सवाल आज हर उस आम नागरिक और जमीनी कार्यकर्ता के मन में कौंध रहा है जो सालों से चुनावी रैलियों में दरी बिछा रहा है, झंडे उठा रहा है, लेकिन जब टिकट या नेतृत्व की बारी आती है, तो किसी बड़े नेता के ‘पुत्र’ या ‘पुत्री’ को उसके ऊपर थोप दिया जाता है।
पुरानी कहावत थी—“राजा का बेटा ही राजा बनेगा।” आधुनिक दौर में सिनेमाई संवाद आए कि—“राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, वही बनेगा जो हकदार होगा।” लेकिन जब हम भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत, खासकर देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबों और मध्य प्रदेश की सियासत को देखते हैं, तो यह आदर्शवादी संवाद हवा में उड़ता नजर आता है। सच यही है कि व्यवस्था का सिर्फ बाहरी स्वरूप और चुनावी प्रक्रिया बदली है, लेकिन सत्ता का मिजाज आज भी पूरी तरह से वंशवादी और राजशाही जैसा ही बना हुआ है।
नेहरू-गांधी परिवार: भारतीय राजनीति में विरासत का सबसे बड़ा प्रतीक
जब भी देश में विरासत की सियासत या परिवारवाद की बात होती है, तो नेहरू-गांधी परिवार इसका सबसे बड़ा और अकाट्य उदाहरण बनकर सामने आता है। देश की आजादी के बाद से ही इस परिवार की पीढ़ियां देश की सत्ता और देश की सबसे पुरानी पार्टी के शीर्ष पर काबिज रही हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ यह सिलसिला इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी वाश्रा तक निर्बाध रूप से जारी है।
दशकों तक देश की सत्ता के केंद्र में रहने वाले इस परिवार ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा चलन स्थापित कर दिया, जिसके बाद देश के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भी इसे ही अपनी राजनीति का मूल मंत्र बना लिया। आज स्थिति यह है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, लगभग हर क्षेत्रीय दल इसी ‘गांधी परिवार मॉडल’ पर चल रहा है, जहाँ पार्टी की कमान और मुख्यमंत्री की कुर्सी केवल एक ही परिवार के वारिस के लिए आरक्षित रहती है।
मध्य प्रदेश की सियासत में ‘राजकुमारों’ का दबदबा
यदि हम राष्ट्रीय स्तर से हटकर मध्य प्रदेश की राजनीति का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो यहाँ भी सत्ता की चाबी दशकों से कुछ चुनिंदा रसूखदार परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। ग्वालियर का सिंधिया राजवंश इसका सबसे सटीक उदाहरण है, जहाँ राजमाता विजयाराजे सिंधिया से शुरू हुआ सफर माधवराव सिंधिया और अब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्या सिंधिया तक लगातार जारी है। इसी तरह राघोगढ़ के किले से निकलने वाली राजनीति पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बाद उनके बेटे जयवर्धन सिंह के रूप में विधानसभा में अपनी जगह पक्की कर चुकी है। छिंदवाड़ा के मजबूत गढ़ में कमलनाथ के बाद उनके बेटे नकुलनाथ पूरी विरासत संभाल रहे हैं। महाकौशल से लेकर मालवा-निमाड़ और बुंदेलखंड तक, हर क्षेत्र में ऐसे दर्जनों विधायक और सांसद हैं जिनके माता, पिता या ससुर पहले से राजनीति के ‘शिखर’ पर बैठे हैं और उन्होंने अपने बच्चों के लिए राजनीतिक जमीन पहले से ही तैयार कर रखी है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़े भी इस कड़वी हकीकत की तस्दीक करते हैं। देश की संसद और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में पहुँचने वाले युवा जनप्रतिनिधियों में से हर तीसरा नेता किसी न किसी स्थापित राजनीतिक परिवार की ही उपज है।
योग्यता बनाम वंशावली: आम कार्यकर्ता की अंतहीन प्रतीक्षा
इस व्यवस्था के पैरोकार अक्सर यह तर्क देते हैं कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति सीधे गद्दी पर नहीं बैठता, बल्कि उसे जनता के बीच जाकर चुनाव जीतना पड़ता है। नेताओं का कहना होता है कि यदि डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और बिजनेसमैन का बेटा बिजनेसमैन बन सकता है, तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता? लेकिन यह तर्क पत्रकारिता की कसौटी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर पूरी तरह खोखला साबित होता है।
एक डॉक्टर या बिजनेसमैन के बेटे को पेशेवर दुनिया में अपनी योग्यता साबित करनी पड़ती है, जबकि राजनीति में नेताओं के बच्चों को ‘नाम की पहचान’ (Brand Recognition), ‘पीढ़ियों से संचित अथाह धनबल’ और ‘पार्टी के भीतर शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त’ बिना किसी संघर्ष के थाली में सजाकर मिल जाता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान उस आम घर के पढ़े-लिखे और जमीनी संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता को होता है, जिसकी पूरी जिंदगी सिर्फ नेताओं के स्वागत में नारे लगाने और दरियां बिछाने में कट जाती है, क्योंकि पार्टियां आंतरिक लोकतंत्र को दरकिनार कर केवल ‘जिताऊ क्षमता’ और ‘पारिवारिक रसूख’ को ही टिकट का पैमाना मानती हैं।
निष्कर्ष: बदला है सिर्फ मुखौटा, मिजाज वही पुराना
पहले के जमाने में राजा का बेटा सीधे गद्दी पर बैठ जाता था क्योंकि उसके पीछे सेना, साम्राज्य और तलवार की ताकत होती थी। आज के दौर में नेता का बेटा ‘पार्टी सिंबल’, ‘कॉर्पोरेट फंडिंग’ और ‘पारिवारिक रसूख’ के दम पर चुनाव मैदान में उतरता है। चूंकि आम जनता के पास भी सीमित विकल्प होते हैं, इसलिए घूम-फिरकर सत्ता की चाबी इन्हीं रसूखदार घरानों की तिजोरियों में बंद रह जाती है।
जब तक भारतीय राजनीतिक दलों के भीतर वास्तविक आंतरिक लोकतंत्र बहाल नहीं होगा और केवल योग्यता के आधार पर आम कार्यकर्ताओं को नेतृत्व का मौका नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र के इस सुंदर मुखौटे के पीछे राजतंत्र की यह अघोषित और अनकही व्यवस्था इसी तरह देश और राज्यों को हांकती रहेगी।
