Home देश BRICS समिट से ठीक पहले अमेरिका का H-1B कार्ड: पुतिन-शी की भारत...

BRICS समिट से ठीक पहले अमेरिका का H-1B कार्ड: पुतिन-शी की भारत यात्रा के बीच मोदी सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति?

0

नई दिल्ली/वॉशिंगटन:
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की बिसात पर कोई भी चाल बिना सोचे-समझे या अचानक नहीं चली जाती। जब पूरी दुनिया की निगाहें नई दिल्ली में आयोजित हो रहे BRICS Summit 2026 पर टिकी हैं, और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ करीब सात साल बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारतीय सरजमीं पर कदम रख रहे हैं—ठीक इसी वैश्विक हलचल के बीच अमेरिकी प्रशासन द्वारा H-1B वीजा नियमों को लेकर लिया गया कड़ा फैसला महज एक प्रशासनिक संयोग नहीं माना जा सकता।

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) द्वारा H-1B वीजा का 60-दिन का ग्रेस पीरियड खत्म करने का नया प्रस्ताव और बड़ी तकनीकी कंपनियों पर कसी गई नकेल, वास्तव में वाशिंगटन की एक सोची-समझी ‘डिप्लोमैटिक टाइमिंग प्रेशर’ (Geopolitical Leverage) रणनीति की ओर इशारा करती है।

भू-राजनीतिक विश्लेषकों के नजरिए से, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे तीन सबसे बड़े कूटनीतिक आयाम छिपे हैं:

1. रूस-चीन से भारत के सामरिक तालमेल पर अमेरिका की ‘अघोषित चेतावनी’

भारत इस समय रूस से अपनी कुल जरूरत का 50% से अधिक कच्चा तेल (Crude Oil) खरीद रहा है और पुतिन की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अत्याधुनिक सैन्य सौदों (जैसे Su-57 फाइटर जेट्स और S-500 एयर डिफेंस सिस्टम) को अंतिम रूप दिया जाना तय माना जा रहा है। वहीं, डोकलाम और गलवान गतिरोध के बाद पहली बार आ रहे शी जिनपिंग के साथ सीमा विवाद और द्विपक्षीय व्यापार को सामान्य करने पर बेहद गंभीर चर्चाएं प्रस्तावित हैं।

अमेरिका इस ‘रूस-चीन-भारत’ के त्रिकोण (Triangle) के मजबूत होने से कूटनीतिक रूप से असहज है। H-1B वीजा पर कड़ा रुख अपनाकर अमेरिका ने भारत को परोक्ष रूप से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि भारत के लाखों हुनरमंद युवाओं के करियर और उनकी टेक-इंडस्ट्री की चाबी आज भी व्हाइट हाउस की नीतियों के नियंत्रण में है।

यह भी पढ़े

H-1B वीजा धारकों को बड़ा झटका: ट्रंप प्रशासन का नया प्रस्ताव—नौकरी जाते ही तुरंत छोड़ना होगा अमेरिका

https://ntvtime.com/h1b-visa-rules-2026-news-in-hindi/

2. ‘टैरिफ वॉर’ के बाद अब ‘वीजा वॉर’ से सौदेबाजी (Bargaining Power)

ट्रंप प्रशासन अपने पहले कार्यकाल से ही भारतीय सामानों पर भारी सीमा शुल्क (Tariffs) लगाने की नीति पर चलता रहा है। अब जब भारत वैश्विक मंच पर पुतिन और जिनपिंग के साथ मंच साझा करके ‘डी-डॉलरलाइजेशन’ (De-dollarization / अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर के प्रभुत्व को कम करना) और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों (Alternative Payment Systems) को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ रहा है, तब अमेरिका ने H-1B वीजा की फीस में $4,000 की बढ़ोतरी और ग्रेस पीरियड खत्म करने का दांव चला है। इसके जरिए अमेरिका ने भारत के सामने कूटनीतिक स्तर पर अपनी सौदेबाजी (Bargaining Power) को मजबूत करने की कोशिश की है।

यह भी पढ़े

प्रीमियम सवारी के शौकीनों के लिए बड़ी खबर: 8K थिएटर स्क्रीन और 700km रेंज के साथ लॉन्च हुई नई BMW 7 Series!

3. ‘ग्लोबल साउथ’ के नेतृत्व को अप्रत्यक्ष चुनौती

BRICS शिखर सम्मेलन के माध्यम से भारत खुद को ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के एक निर्विवाद और मजबूत वैश्विक नेता के रूप में स्थापित कर रहा है। पश्चिमी देशों को यह भली-भांति पता है कि भारत की सबसे बड़ी आर्थिक और वैश्विक ताकत उसकी ‘सॉफ्ट पावर’ यानी उसकी कुशल मानव संसाधन (Skilled Tech Workforce) है। ऐसे में कॉग्निजेंट जैसी बड़ी आईटी कंपनियों के नए ग्रीन कार्ड (PERM) आवेदनों पर रोक लगाना और वीजा धारकों को नौकरी जाते ही देश छोड़ने का अल्टीमेटम देना, सीधे तौर पर भारत की इसी आर्थिक रीढ़ पर दबाव बनाने का प्रयास है।

मोदी सरकार के सामने दोहरी कूटनीतिक परीक्षा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस सप्ताह एक बड़ी रणनीतिक और कूटनीतिक परीक्षा होगी। एक तरफ जहां उन्हें रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय हितों, सीमा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार पर वार्ता को आगे बढ़ाना है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका के इस नए वीजा संकट से अपने लाखों प्रवासियों और तकनीकी विशेषज्ञों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए वाशिंगटन के साथ बैक-चैनल डिप्लोमेसी (Back-channel Diplomacy) को भी सक्रिय करना होगा।


अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यह बुनियादी नियम है कि जब दो महाशक्तियां आपस में हाथ मिलाती हैं, तो तीसरी महाशक्ति अपने सबसे प्रभावी हथियारों का इस्तेमाल संतुलन बनाने के लिए करती है। पुतिन और शी जिनपिंग के भारत में लैंड होने से ठीक पहले H-1B नियमों की कड़ाई, अमेरिका द्वारा भारत को यह याद दिलाने की एक रणनीतिक कोशिश है कि नई वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में वाशिंगटन को नजरअंदाज करना नई दिल्ली के लिए आर्थिक और सामाजिक रूप से कितना संवेदनशील हो सकता है।

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version