18 अक्टूबर शुभारंभ के अवसर पर
नवपद ओली की आराधना-तपस्या पाप कर्मों का क्षय करने का पर्व है—
(इस पर्व का जैन धर्म में विशेष महत्त्व होता है)
शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिए तथा तन मन को निर्मल बनाने के लिए लगभग हर धर्म में उपवास और तपस्या आदिः–जैसे हिंदू धर्म में नवरात्री तथा जैन धर्म में आत्मा के लिए ओली जी की तपस्या से जीवन को अनमोल हीरा बनाया जाता है।
हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा हजारों सितारों में चांद एक ही होता है, हजारों वृक्षों में चंदन एक ही होता है, खानों में पत्थर तो कई मिलते हैं, लेकिन हीरा लाखों में एक ही मिलता है, हजारों मंत्रो में दुर्लभ नवकार मंत्र एक ही होता है। नव पद ओली जी की तपस्या की आराधना सभी तपस्या में सर्वश्रेष्ठ होती हैं। आयंबिल की तपस्या हमारे पाप कर्मों को क्षय करती है।
जैन धर्म के अनुसार साल में दो बार ओलीजी की तप आराधना की जाती है। चैत्र मास के शुक्ल सप्तमी से पूर्णिमा (25 मार्च 2 अप्रैल तक 2026, जो संपन्न हुई) तथा आश्विन मास में शुक्ल पक्ष के सप्तमी से पूर्णिमा ( 18 अक्टूबर से 26 अक्टूबर, 2026) तक ओली जी तप की आराधना की जायगी।
नवपद ओलीजी की तपस्या का महत्व जानना अत्यंत आवश्यक है। इस तपस्या के करने से आत्मा पवित्र और मन शुद्ध होता है। ओलीजी की तपस्या की साधना से रोग, शोक और व्याधियां नहीं होती है। कष्ट दूर होते हैं ।जीवन में आने वाली विपत्तियां दूर होती है। इससे त्याग की प्रेरणा मिलती है। श्रीपाल महाराज जब पांच वर्ष की आयु में थे, तो उनके पिता का
स्वर्गवास हो गया। उन्हें पांच वर्ष की आयु में ही राजगद्दी पर विराजित किया गया तथा उनका जीवन विपत्ति और संघर्ष से भरा था, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं खोया और श्री पाल महाराज का जीवन नवपद आराधना के साथ धर्म से जुड़ गया था। इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने अपने जीवन में कई संसारी सिद्धियाँ प्राप्त की।
मनुष्य यदि धर्म और धैर्य दोनों ही जीवन में आत्म करें तो जीवन महान और उन्नत बन सकता है। तपस्या आत्मा को जीवन का अनमोल हीरा बना देती है। नवपद आराधना एवं वैमनस्य को हटाकर मैत्री भाव जगाती है। दिल से दान देने वाला दानवीर कहलाता है। उसी प्रकार जो तप करता है, वह उतना ही निर्मल
बनता है। हमें ओली की तपस्या का सात्विक सत्य जानकर ही तपस्या करनी चाहिए। कई जैन श्रावक-श्राविकाओं को नवपद ओलीजी साधना तपस्या का वास्तविक परिचय नहीं होने के कारण, संज्ञान नहीं होता है।
यहां बता दें ओली जी की एक ऐसी तप साधना है, जिसमें साधक नौ दिनों तक नो पदों का स्मरण आराधना, आयंबिल और धार्मिक क्रियाएं करते हैं । इसका उद्देश्य आत्म शुद्धि कर्मों की निर्जरा और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होना है।
नवपद ओली जी की आराधना से मन पवित्र होता है, और आत्मा शुद्ध होती है। नवपद ओलीजी की तपस्या आराधना से मोक्ष मिलता है। गौतम स्वामी महाराज ने कहा कि उसका अनुभव किया जा सकता है, वर्णन नहीं किया जा सकता है। नवपद ओलीजी रास सम्यक रास जगाता है। नवपद की आराधना का ध्यान हृदय में आत्मा साथ करें तो नवपद का आनंद 100 गुना ज्यादा हो जाता है।
भगवान महावीर श्री देशना के अनुसार नवपद ओली आत्मकल्याण का सर्वोत्तम साधना है। यह जिन शासन के नौ रत्न अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यक दर्शन और सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और तप की आराधना है। हर रत्न के गुणों के अनुसार क्रियाएं होती है। आयबिल में उसी रंग के खाद्य पदार्थ का सेवन किया जाता है, जो उस गुणधर्म से जुड़ा होता है। नवपद की आराधना के लिए छह
माह पूर्व ही अभ्यास प्रारंभ कर देने से नवपद की तपस्या की खुशियाँ दुगुनी होकर दुगुना आनंद देती है। नवपद ओलीजी से आयंबिल तपस्या उपवास के साथ नवकार महामंत्र, भक्तामर पाठ, शाति जाप करके इस तप की आराधना की जाती है। आयंबिल के दौरान रूक्ष, सिनग्धता रहित, लवण रहित, उबला हुआ, सुपाच्य लघु भोजन एक समय खाने को तथा धोवन पानी सूर्यास्त पूर्व तक पीने का विधान है। प्रतिदिन आयंबिल में बिना तेल, घी, मिर्च मसाले के भोजन के साथ किया जाता है। ओली तप वास्तव में वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। निश्चित ही नवपद आराधना को सच्चे मन से आत्मसात करें, तो संसार सागर से भवपार हो सकता है। जैसा कि श्रीपाल और मैयना सुन्दरी ने नवपद की आराधना की तो, तो, उन्हें शांति और संतोष मिला था। नवपद ओली तपस्या की आराधना को हृदय से जीवन में आत्मसात करना चाहिए, तभी आत्मा का कल्याण हो सकता है ,नवपद ओली की तपस्या आराधना आत्म कल्याण का सशक्त माध्यम होता है।
डॉ. बी. आर. नलवाया, मंदसौर, मध्य प्रदेश,458001
