जिसका उदय हुआ है उसका अस्त भी निश्चित है: क्या ‘अहंकार की राजनीति’ और चुनावी संस्थाओं का विवाद बन रहा पतन की वजह?
राजनीति में कोई भी साम्राज्य शाश्वत नहीं होता। इतिहास गवाह है कि जब जनसमर्थन का ग्राफ़ अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो अक्सर सत्ताधारी दलों के भीतर एक खतरनाक मनोवैज्ञानिक बदलाव आता है। देश के मौजूदा सियासी माहौल में यह बात गहराई से रेखांकित हो रही है कि जिसका भी उदय हुआ है, उसका अस्त भी निश्चित है, इसलिए किसी को भी अहंकार के मुगालते में नहीं रहना चाहिए। इस वैचारिक चेतावनी के तुरंत बाद चुनाव आयोग (ECI) के भीतर ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर दो चुनाव आयुक्तों के आंतरिक मतभेद और 14 बार दर्ज कराई गई आपत्तियों की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है। विपक्ष के नेताओं द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और ‘वोट चोरी’ के गंभीर आरोपों ने इस पूरे घटनाक्रम को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जो भाजपा के लिए आने वाले समय में गहरा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है।
1. ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की मानसिकता: कांग्रेस के पतन से भाजपा के वर्तमान तक
संस्कृत का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ही ब्रह्म हूँ) जब अध्यात्म से निकलकर राजनीति में प्रवेश करता है, तो यह आत्ममुग्धता और निरंकुशता का रूप ले लेता है।
- कांग्रेस का पुराना ढर्रा और दुर्दशा: स्वतंत्रता के बाद दशकों तक अजेय रहने वाली कांग्रेस के पतन की शुरुआत तब हुई जब उसके शीर्ष नेतृत्व को यह भ्रम हो गया कि देश की जनता के पास उनके अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। आंतरिक लोकतंत्र की समाप्ति, चाटुकारिता को बढ़ावा और जमीनी हकीकत से कटना कांग्रेस को गर्त में ले गया। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई, वह इसी आत्ममुग्धता का परिणाम थी।
- भाजपा में इतिहास की पुनरावृत्ति?: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में लगातार मिली चुनावी सफलताओं ने भाजपा के भीतर भी इसी तरह की ‘अहं ब्रह्मास्मि’ वाली मानसिकता को जन्म दिया है। जब संगठन के भीतर नीतियों और निर्णयों पर सवाल उठाना बंद हो जाए, तो वैचारिक क्षरण शुरू हो जाता है। वर्तमान हालात इसी आंतरिक जड़ता की ओर एक सीधा इशारा हैं कि समय रहते इस घमंड को नहीं त्यागा गया, तो जो हाल कांग्रेस का हुआ था, वह किसी भी दल का हो सकता है।
2. जमीनी हकीकत: नेता और ‘नेता पुत्रों’ का रुतबा, वीआईपी संस्कृति और जनता की आहत भावनाएं
किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसका जमीनी कार्यकर्ता और आम जनता का भरोसा होती है। लेकिन वर्तमान में भाजपा के भीतर एक नया सत्तावादी संभ्रांत वर्ग पनप रहा है।
- नेताओं और उनके बेटों का ‘रूतबा और रुआब’: देश के विभिन्न राज्यों से आ रही रिपोर्टें बताती हैं कि भाजपा के कई रसूखदार नेताओं और उनके बेटों (नेता पुत्रों) का व्यवहार सामंती होता जा रहा है। सत्ता के संरक्षण में प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाना, आम नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार और ‘वीआईपी कल्चर’ का खुला प्रदर्शन धरातल पर दिख रहा है।
- मौन बैठी जनता का आक्रोश: भारत का आम वोटर बहुत संवेदनशील है। वह भले ही तुरंत अपनी प्रतिक्रिया न दे, लेकिन नेताओं के अहंकार, राजसी ठाठ-बाठ और जनता की मूलभूत समस्याओं (जैसे महंगाई, बेरोजगारी) के प्रति असंवेदनशीलता को बहुत बारीकी से देखता है। जब जनता को लगता है कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि अब खुद को ‘शासक’ समझने लगे हैं, तो वे खामोशी से अपना मन बदलने लगते हैं। भाजपा का यह ‘घमंड’ ही आज जनता को विकल्प तलाशने पर मजबूर कर रहा है।
3. चुनाव आयोग का आंतरिक विवाद: संस्थागत साख पर चोट और राजनीतिक क्षति
राजनीतिक पटल पर चल रही इस उथल-पुथल के बीच चुनाव आयोग की आंतरिक कलह ने जलती आग में घी का काम किया है। खोजी रिपोर्टों के मुताबिक, मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ियों और नामों को हटाने को लेकर दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने 10 महीने में 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।
- संस्थाओं की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल: इस खुलासे के बाद लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तंभ ‘चुनाव आयोग’ की विश्वसनीयता दांव पर लग गई है। जब आयोग के ही दो वरिष्ठ सदस्य मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली और निर्णयों पर असहमति जताते हैं, तो यह संदेश जाता है कि संस्थाएं स्वतंत्र नहीं रह गई हैं।
- भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान: विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है। राहुल गांधी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस करना और प्रियंका गांधी द्वारा इसे “देशद्रोह” और “लोकतंत्र की हत्या” करार देना, ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के मतदाताओं के बीच यह अविश्वास पैदा कर रहा है कि उनके वोटों के साथ खिलवाड़ हो रहा है। यह नैरेटिव भाजपा के “सुशासन और पारदर्शिता” के दावों को ठेस पहुंचाता है और आगामी चुनावों में सत्ता पक्ष के लिए एक बहुत बड़ा ‘पॉलिटिकल डैमेज’ साबित हो सकता है।
आत्ममंथन या पतन?
‘उदय और अस्त’ के इस शाश्वत दर्शन को यदि चुनाव आयोग के वर्तमान संकट के साथ जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर साफ हो जाती है। जब सत्ता का अहंकार संस्थाओं को दबाने लगे और नेताओं का व्यवहार जनता को छोटा समझने लगे, तो पतन की शुरुआत निश्चित है। भाजपा के शीर्ष रणनीतिकारों के लिए यह समय जश्न मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। यदि उन्होंने समय रहते अपने नेताओं के व्यवहार में सुधार नहीं किया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को बहाल नहीं होने दिया, तो जनता का यही खामोश गुस्सा उनके राजनीतिक अस्त की मुख्य वजह बन जाएगा।
