वैश्विक तेल संकट के बीच भारतीय रुपया सर्वकालिक निचले स्तर पर, रिजर्व बैंक ने संभाली कमान
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली — 18 अगस्त 2026: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण भारतीय वित्तीय बाजार पर दबाव गहरा गया है। मंगलवार को विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सर्वकालिक निचले स्तर 95.68 पर बंद हुआ। वहीं, वैश्विक कमोडिटी एक्सचेंज पर ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें उछलकर 91.14 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। बाजार में अचानक आई इस तीव्र गिरावट को नियंत्रित करने और रुपये को स्थिरता देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा है।
कच्चे तेल में उबाल और भू-राजनीतिक कारण
ऊर्जा बाजार में आई इस हालिया तेजी का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता कूटनीतिक और सैन्य तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 60 दिनों का अंतरिम शांति समझौता बिना किसी ठोस निष्कर्ष के समाप्त हो गया है। इसके तुरंत बाद ईरान द्वारा अपनी सैन्य स्थिति को आक्रामक करने की घोषणा से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। वैश्विक तेल व्यापार के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिम के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल प्रीमियम तेजी से बढ़ा है, जिसका सीधा असर भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
घरेलू मोर्चे पर डॉलर की मांग और आरबीआई का एक्शन
भारत अपनी कच्चे तेल की कुल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। तेल की कीमतें बढ़ने के कारण घरेलू तेल विपणन कंपनियों द्वारा आयात भुगतानों के लिए अमेरिकी डॉलर की आक्रामक खरीदारी की जा रही है, जिससे रुपये पर चौतरफा दबाव बन गया है। इसके अतिरिक्त, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रियायती एफसीएनआर-बी विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा को समय से पहले बंद करने के निर्णय से भी बैंकिंग प्रणाली में डॉलर की तरलता प्रभावित हुई है।
विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की गिरावट की रफ्तार को थामने के लिए केंद्रीय बैंक ने सक्रिय रुख अपनाया है। बाजार सूत्रों के अनुसार, आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से स्पॉट मार्केट में डॉलर की भारी आपूर्ति की है। इस रणनीतिक कदम का उद्देश्य मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को रोकना और रुपये को एक सीमित दायरे में बनाए रखना है। विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल 95.75 के स्तर को एक मजबूत प्रतिरोध के रूप में बचाने का प्रयास कर रहा है।
व्यापक आर्थिक प्रभाव और बाजार का आउटलुक
कमजोर होते रुपये और महंगे कच्चे तेल का सीधा असर भारत के व्यापक आर्थिक संकेतकों पर पड़ सकता है। इससे देश का चालू खाता घाटा बढ़ने का जोखिम है, जिससे आयातित महंगाई की स्थिति पैदा हो सकती है। माल ढुलाई महंगी होने से आने वाले समय में खुदरा कीमतों पर भी दबाव देखने को मिल सकता है। इसी चिंता के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय इक्विटी बाजार से पूंजी की निकासी तेज कर दी है, जिससे घरेलू शेयर सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई है।
बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब तक मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य नहीं होती, तब तक वित्तीय बाजारों में यह उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता का माहौल बना रह सकता है।
